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बुधवार, मई 12, 2021

Necessity विश्व के 16% लोग नास्तिक क्यों हो गए?

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आज विश्व के 16% लोगों को The necessity of atheism क्यों है? ऐसे क्या कारण हैं जिस की वजह से ये आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं, जो कथित धार्मिक गिरोहों की पोल खोलने वाले हैं।

सभी धार्मिक दावा करते हैं कि धर्म लोगों की बराबरी, प्रेम, परोपकार, मन की शुद्धता आदि के लिए हैं। वे यह भी कहते हैं कि धर्म ईश्वर के नज़दीक जाने का ज़रिया है। साथ ही यह एक बेहतर जीवन तथा मरने के बाद भी कई चीज़ें मुहैया कराता है। जबकि, यह सिर्फ सब वादे हैं। आप भी जानते हैं कि जीवन में धार्मिक बने रहने से ऐसा कुछ नहीं होता है।

Why is atheism necessity?

ऐसा सिर्फ बताया जाता है कि कोई भी धर्म राज करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि मानवता की भलाई करने के लिए शुरु किये गए हैं। लेकिन व्यवहार में ऐसा कहीं है नहीं। आज The necessity of atheism इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि धर्म के नाम पर तरह-तरह के पागलपन हो रहे हैं। हर तरफ धार्मिक प्रचार से लोगों को अपने धर्म में शामिल करने की होड़ सी मची है।

नास्तिकता आवश्यक क्यों है?

  • कौन सा धर्म सबसे पुराना है?
  • कौन सा धर्म सबसे अच्छा है?
  • किनके धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है?
  • कौन सा धर्म का लोग सड़क अधिक जाम करता है?
  • कौन से धर्म के लोग ज़्यादा शोर मचाते हैं?
  • कौन से धर्म के लोगों के ज़्यादा इबादतगाह हैं?

अजीब-अजीब से सवाल और प्रतिद्वंद्विता हैं। Necessity atheism instead of competition…!

धर्म तो सत्ता को बरकरार रखने का एक औज़ार है।

धर्म के दावे और उनके मानने वाले लोगों के व्यवहार में बहुत फर्क है। वह इसलिए क्योंकि धर्म वास्तव में सत्ता की भूख के लिए और सत्ता को बनाए रखने के लिए चलने दिया जा रहा है।

कभी लोगों को गुलाम बनाने के लिए ईसाई मिशनरियों ने धर्म का सहारा लिया और औपनिवेशिक दासता को बढ़ावा दिया। कभी धर्म के नाम पर युद्ध कर लोगों की हत्याएं की गई और तो और वहीं धर्म के नाम पर ही आत्मघाती भी तैयार किये जाते हैं।

आप भारत में ही देख लें, यहाँ मंदिर-मस्जिद को बनाने को लेकर कितना पागलपन है। क्या मंदिर की मांग रखने वालों में से किसी को स्कूल या चैरिटी हॉस्पिटल खोलने के लिए पागल होता देखा है, आपने? नहीं ना, आज भारत में ही लगभग 25 लाख आराधना स्थल हैं और स्कूल केवल 15 लाख। जैसा कि मैने कहा है कि ये सब कम्पटीशन है, कम्पटीशन।

अपनी संख्या बढ़ाने के लिए, मंदिर-मस्जिद खड़ी करने का और अपने धर्म को ऊँचा साबित करने लिए।

दुनिया भर के ढोंग, आडम्बर, कुरीति, महिलाओं को दोयम दर्जा देना आदि सब इसी की आड़ में तो पनपाए जाते हैं।

धर्म के नाम पर ही ये देश टूट चुका है।

और आज भी उसी धर्म की बात कर के ही राजनीति जारी है।

  • भारत व पाकिस्तान का विभाजन भी तो धर्म के आधार पर ही हुआ था। उस विभाजन के दौर में जिसमें हज़ारों लोग मरे थे।
  • राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद ने कितनों की जान ले ली थी ये कौन नहीं जानता…?
  • ज़्यादातर दंगे किस वजह से होते हैं? धर्म कि वजह से!

आज देखिये, हिन्दू-मुस्लिम के बीच भेद की दीवार और भी बढ़ चुकी है, जिसे नेता वोट की राजनीति की खातिर बढ़ाते ही जा रहे हैं। मुझे आशा है, भविष्य में शायद धर्म इस रूप में राज नहीं कर पाएंगे।

गौर करिए तो आज़ इन्टरनेट और सोशल मीडिया के दौर में ज़्यादातर युवा, भक्त बनना त्याग रहें हैं और अंधश्रद्धा से वे नास्तिकता, संशयवादी, धर्मनिरपेक्षता, एको-धर्म, इंगेज्ड स्पिरीचुअलिटी (Engaged Spirituality) आदि की तरफ बढ़ रहे हैं। इसलिए संभव है कि नास्तिक या बिना धार्मिक ठप्पेवाले लोगों की संख्या सर्वाधिक होगी। वैसे तो आज विश्व में उनकी संख्या 16% पहुंच गई है।

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