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सोमवार, मई 17, 2021

Charles Darwin | क्यों ईश्वर के कातिल कहे गए?

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“कभी पादरी बनने की तैयारी कर चुके Charles Darwin नहीं जानते थे, कि एक समुद्री यात्रा उनका जीवन बदलने वाली है”।

‘मैं एक बूढ़ा और बीमार व्यक्ति हूं जिसके बहुत सारे काम पहले से बाकी हैं। ऐसे में आपके सभी सवालों का जवाब देकर मैं अपना समय ज़ाया नहीं कर सकता और न ही इनका पूरा जवाब दे पाना संभव है। विज्ञान का क्राइस्ट (ईसा) के अस्तित्व से कुछ भी लेना-देना नहीं। मैं नहीं मानता कि ईश्वर ने किसी दूत के जरिए अपनी प्रकृति और मनुष्य की रचना में निहित अपने उद्देश्यों को को कभी बताया होगा।’

~चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन

ये पंक्तियाँ उस पत्र की हैं, जो 1879 में चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ने किसी जर्मन विद्यार्थी के लिए लिखवाया था। उनके बेटे फ्रांसिस डार्विन ने अपनी किताब The Life and Letters of Charles Darwin में इस खत का जिक्र किया है। अपने पिता के बारे में बताते हुए फ्रांसिस अपनी किताब में कहते हैं, ‘धर्म से जुड़े मामलों में वे अक्सर चुप ही रहते थे। इस विषय में उन्होंने जो भी राय रखी वह उनकी अपनी निजी सोच थी जो कभी प्रकाशित करने के उद्देश्य से नहीं कही गयी थी।’

धर्म के बारे में कुछ खुलकर बोलने से डार्विन ताउम्र बचते रहे। इसके बावजूद उनके लिखे कई पत्रों और उनकी कई किताबों में ईसाइयत के प्रति उनके विरोधी विचार साफ नज़र आते हैं। अपनी जीवनी में Charles Darwin ने लिखा था, ‘जिन चमत्कारों का समर्थन ईसाइयत करती है उन पर यकीन करने के लिए किसी भी समझदार आदमी को प्रमाणों की आवश्यकता जरूर महसूस होगी। उस समय का इंसान हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा सीधा और अनभिज्ञ था जब इन चमत्कारों के बारे में बताया गया था’।

ईसाइयत से जुड़े साहित्य Gospel पर संदेह से हुई शुरुआत

ईसाइयत से जुड़े शुरुआती साहित्य Gospel (इसमें ईसा के जीवन, मृत्यु और उनके फिर जी उठने से जुड़ी कहानियां हैं) पर संदेह करते हुए डार्विन ने कहा था, ‘इस किताब में लिखे वर्णनों और चमत्कारों की कहानियों में भी मुझे विरोधाभास नज़र आता है। जैसे-जैसे इन विरोधाभासों का प्रभाव मुझ पर बढ़ता गया ‘Revelation’ के रूप में ईसायत पर से मेरा विश्वास भी उठता चला गया।’ (‘Gospel’ को ईसा मसीह के बारह शिष्यों में से एक थॉमस ने लिखा था। ये वही थॉमस थे जो ईसा के बाद 50वीं ईस्वी में उनके संदेशों को लेकर भारत आए थे और 72वीं ईस्वी में चेन्नई के सेंट थॉमस माउंट पर एक भील के भाले से मारे गए थे।)

ईश्वर की राह पर पादरी बनने की तैयारी थी

ऐसा नहीं था कि Charles Darwin हमेशा से अनीश्वरवादी थे। एक समय ऐसा भी था जब युवा डार्विन ने पादरी बनने की पूरी तैयारी कर ली थी। अपनी ऑटोबायोग्राफी में डार्विन इसका जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘मेरे पिता ने मुझसे कहा कि मैं पादरी बन जाऊं तो बेहतर होगा। मैंने सोचने के लिए मोहलत मांगी ताकि Church of England के सभी धर्मसूत्रों के प्रति अपने मन में विश्वास पैदा कर सकूं। इसी क्रम में मैंने ईसाइयों के कई धर्मग्रंथ बेहद सावधानी के साथ पढ़े। उस समय तो Bible के प्रत्येक शब्द में वर्णित सत्य का कड़ा और अक्षरश: पालन करने में मुझे कोई संदेह नहीं रह गया था। मैं जल्द ही इस बात को मानने लगा कि ईसाई मतों के सिद्धांतों का पूरी तरह से पालन होना चाहिए।’

डार्विन पहले समुद्री यात्राओं पर Bible लेकर जाते थे

उस दौर में ये धर्मग्रंथ और इनके विचार डार्विन पर इस कदर हावी थे कि अपनी शुरूआती दोनों समुद्री यात्राओं पर (समुद्री पोत एच.एम.एस बीगल पर) वे अपने साथ Bible ले गए थे। लेकिन तब डार्विन खुद भी नहीं जानते थे कि इस यात्रा के हर पड़ाव के साथ वे धीरे-धीरे ‘विज्ञान’ के पास और ‘धर्म’ से दूर होते चले जाएंगे।

डार्विन पहले धर्म को लेकर घोर कट्टरवादी थे

इस बारे में डार्विन लिखते हैं, ‘इन दो सालों (अक्टूबर 1836 से जनवरी 1839) के दौरान मुझे धर्म के बारे में ढंग से सोचने का मौका मिला। जब मैंने बीगल पर अपनी यात्रा की शुरूआत की थी मैं धर्म को लेकर घोर कट्टरवादी था। मुझे याद है कि जब मैं नैतिकता से जुड़े कई मुद्दों पर Bible को किसी अकाट्य संदर्भ की तरह पेश करता था तो किस तरह जहाज के कई अधिकारी मुझ पर हंसा करते थे।’

वक्त के साथ डार्विन जैसे-जैसे अपना शोध आगे बढ़ाते गए, धर्म से उनका भरोसा कम होता चला गया. बताया जाता है कि डार्विन ने अपनी बेटी ‘ऐनी’ की मौत के बाद पूरी तरह से खुद को अपने शोध कार्यों में झोंक दिया था। इसी दौरान धीरे-धीरे बाइबिल और जीसस क्राइस्ट पर से उनका विश्वास उठता चला गया। इस बात का जिक्र उन्होंने 24 नवंबर,1880 को लिखे एक ऐतिहासिक खत में किया था। डार्विन ने फ्रांसिस एम.सी. डेर्मोट के एक पत्र का जवाब देते हुए अपने खत में साफ-साफ लिखा था, ‘मुझे आपको यह बताने में खेद है कि मैं Bible पर पवित्र रेवेलेशन के तौर पर भरोसा नहीं करता। यही कारण है कि मुझे जीसस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है।’ (2015 में न्यूयॉर्क में नीलामी के दौरान इस पत्र की बोली 197,000 यूएस डॉलर लगाई गई थी)

चर्च के साथ जंग की शुरुआत

ऐसा नहीं था कि सिर्फ डार्विन ही धर्म के खिलाफ थे। जंग दोनों तरफ से बराबर छिड़ी हुई थी। लेकिन चर्च और ईसाई धर्मगुरूओं का डार्विन के प्रति विरोध उनके विरोध से कहीं ज्यादा प्रबल और व्यापक था। चर्च और उनके अनुयायियों को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत बिल्कुल मान्य नहीं थे. उन्हें लगता था कि डार्विन की थ्योरी मनुष्य और जानवरों के बीच के अंतर को ही खत्म कर देगी। लेकिन इससे कहीं ज्यादा संगीन आरोप जो डार्विन पर लगा, वह यह था कि उनके सिद्धांतों ने परमेश्वर, उनके पुत्र यीशू और ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ Bible के ही अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए थे।

ईसाई धर्मगुरूओं से हुआ मतभेद

जेम्स उश़ेर समेत तमाम ईसाई धर्मगुरूओं का (बाइबिल के हवाले से) मानना था कि पृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी। लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखों-करोड़ों वर्ष पहले का बताती थी।

डार्विन के तर्कों से धर्मगुरूओं को दूसरी बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी जिसमें उसने पेड़-पौधे, जीव-जंतु, पहाड़-नदियां और मनुष्य को अलग-अलग छह दिन में बनाया था। (बाइबिल के मुताबिक परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी बनाए। दूसरे दिन आसमान। तीसरे दिन पानी को एक जगह इकठ्ठा कर ईश्वर ने धरती और समुद्र बनाए और धरती पर पेड़-पौधे लगाए। चौथे दिन परमेश्वर ने तारों का निर्माण किया। पांचवें दिन परमेश्वर ने समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं के साथ उड़ने वाले पक्षियों को बनाया और छठे दिन परमेश्वर ने धरती और जानवरों पर अधिकार के लिए अपनी छवि में इंसान की रचना की और उसे गिनती में बढ़ने का आशीर्वाद दिया।)

डार्विन ने दिया विकासवाद का सिद्धांत

लेकिन डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत इस पूरी प्रक्रिया से उलट एक अलग ही कहानी कहता था।
डार्विन ने विकासवाद पर आधारित अपनी किताब, Origin of the Species में लिखा था,
‘मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने अलग-अलग बनाया था।’
डार्विन कहते थे कि ये सारे जीव कुछ चुनिंदा जीवों के वंशज हैं जिनमें वक्त के साथ परिवर्तन आते गए
और धरती पर लाखों प्रजातियों का जन्म हुआ।
उनके मुताबिक पीढ़ी दर पीढ़ी सूक्ष्म बदलावों के कारण बड़े बदलाव घटित हुए,
जैसे मछलियां जल-थल जंतुओं में तब्दील हो गईं और बंदर इंसान में। इन्ही बदलावों को ‘महाविकास’ कहा जाता है।’

इन्हीं ईश्वर विरोधी सिद्धांतों को देखते हुए डार्विन पर ईश्वर के अस्तित्व को ही
मिटाने की कोशिशों के आरोप लग रहे थे। उनके जीवन पर बनी फिल्म
Origin of the Species in Creation (2009) के प्रकाशन से जुड़ी
बातचीत के दौरान थॉमस हेनरी हक्सले डार्विन से कहते हैं,
‘इसके बाद ईश्वर एक सप्ताह में सारे सजीवों के निर्माण का दावा नहीं कर सकता,
आपने तो ईश्वर का कत्ल कर दिया है श्रीमान।’

चर्च के विरुद्ध डार्विन अकेले वैज्ञानिक नहीं थे

लेकिन Charles Darwin अकेले ऐसे वैज्ञानिक नहीं थे जिनके सिद्धांत ईसाइयत के विरुद्ध थे।
उनसे पहले कॉपरनिकस, जियोर्डानो ब्रूनो और गैलिलियो गैलिली
जैसे विचारक और विज्ञानी अपने-अपने दौर में चर्च की मुखालफत कर चुके थे
जिसका उन्हें खामियाजा भी उठाना पड़ा था। कॉपरनिकस ने अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन अपने आखिरी समय में किया था।
इस कारण वे तो धर्मगुरुओं की नाराजगी का शिकार होने से बच गए थे
लेकिन ब्रूनो और गैलिलियो को ईश्वरीय मान्यताओं का खंडन करने के आरोप में चर्च ने कड़े दंड दिए थे।
धर्मगुरूओं ने गैलिलियो को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और ब्रूनो को तो सरेआम जिंदा जलवा दिया था।

डार्विन किताब के प्रकाशन की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे

शायद यही कारण था कि डार्विन ने अपनी समुद्री यात्राओं के अनुभवों पर
आधारित किताब The Voyage of Beagle का प्रकाशन तो 1839 में कर दिया था
लेकिन, शोध के लगभग 20 साल बाद तक भी वे प्राणियों के विकासवाद से
जुड़ी किताब के प्रकाशन की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे। उनके इस किताब को
न छापने के पीछे की एक प्रमुख वजह उनकी पत्नी एमा डार्विन को भी बताया जाता है।
कहते हैं कि सरल स्वभाव की एमा को चर्च में अटूट विश्वास था
और डार्विन अपनी पत्नी को धर्म पर कुठाराघात करती कोई भी किताब छापकर उन्हें दुख नहीं पहुंचाना चाहते थे।

एक प्रशंसक की वजह से करनी पड़ी किताब के प्रकाशन की घोषणा

लेकिन 26 जून 1859 को डार्विन को मिले एक पत्र ने उन्हें
एक बार फिर इस किताब को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया।
यह पत्र अल्फ्रेड रसेल वॉलेस नाम के एक व्यक्ति का था जो डार्विन का प्रशंसक था
और उन्हीं की तरह विकासवाद की थ्योरी पर काम कर रहा था।
डार्विन को लिखे खत में वॉलेस ने उनसे अपने शोध के प्रकाशन को लेकर सलाह मांगी।
इस बात से डार्विन के मन में यह आशंका पैदा हो गई कि
यदि वे अपने शोध को जल्द ही लोगों के सामने लेकर नहीं गए तो वॉलेस उनका पूरा श्रेय ले जाएंगे।

जल्द ही डार्विन ने वॉलेस का नाम अपने शोध में जोड़ते हुए इसके प्रकाशन की घोषणा कर दी।
इसके बाद नवबंर 1859 में ऐतिहासिक किताब On the Origin of Species: By Means of Natural Selection
छप कर तैयार हुई जिसने मानव जीवन के रहस्यों से पर्दा हटाने का अभूतपूर्व काम किया।
इस किताब को जैव विकास से जुड़े विज्ञान की बुनियाद कहा जाता है।

डार्विन के सिद्धांत पढ़ाने पर चलाया गया था चर्चित केस ‘मंकी ट्रायल’

किताब छप तो गई थी लेकिन चारों तरफ Charles Darwin का जमकर विरोध शुरू हो गया था। खुद के खिलाफ हो रहे विरोध से डार्विन इतने आहत थे कि इसका जिक्र करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, ‘यह नर्क जैसा है।’ चर्च के साथ मीडिया ने भी इस किताब के लिए Charles Darwin को आड़े हाथों लिया था। बताया जाता है कि यह जानकर कि इंसान वानर का वंशज हैं अमेरिका औऱ यूरोप के कई लोग बुरी तरह से हिल गए थे। उसी का परिणाम था कि किताब के प्रकाशन के बाद अमेरिका और पूरे यूरोप के स्कूल-कॉलेजों में डार्विन की थ्योरी पढ़ाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। डार्विन के सिद्धांत पढ़ाने पर जीव विज्ञान के एक अध्यापक पर अमेरिका की एक अदालत में आधुनिक दुनिया के सबसे चर्चित केसों में से एक चलाया गया था जिसे मंकी ट्रायल के नाम से जाना जाता है।

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