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रविवार, मई 16, 2021

Communal | कौमी एकता का गुब्बारा

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आजकल सोशल साइट्स पर एक से बढ़कर ज़हर भरे लोग मिल जायेंगे जिन्होंने सीधा व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिला ज्ञान धारण कर लिया है कि Communal Muslim ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं, उनका यह इतिहास है, उनमें यह कमियाँ होती हैं, वह कमियाँ होती हैं।

अगर आपको थोड़ी भी सही जानकारी है तो आप देखते ही समझ जाते हैं कि उनकी बात में कितनी तथ्यात्मक ग़लतियाँ हैं… और यह वह लोग होते हैं जिनके निजी जिंदगी में मुसलमानों से जुड़े अनुभव वैसे नहीं होते, लेकिन फिर भी वे उन बातों पर यकीन कर लेते हैं कि वाकई सब सच है और मुसलमान वैसे ही होते हैं।

अब एक Communal मुस्लिम के तौर पर आत्ममंथन कीजिये

जी हाँ, अब एक Muslim के तौर पर आत्ममंथन कीजिये कि कैसे वे सहज रूप से इस तरह के Propaganda पे यकीन कर लेते हैं, कैसे हमारे बारे में यह मिथ्या धारणायें भी उन्हें क़ाबिले यकीन लगती हैं। इस पहलू को समझने के लिये आप जहां भी खड़े हों, वहां से अतीत में चले जाइए।

अब ज़रा, याद करिए, कि पहली बार आपको घर या बाहर किसी ने समझाया होगा कि सलाम सिर्फ मोमिन पर लाज़िम है, हिंदू काफ़िर होते हैं और उनके पूजा स्थल शिर्कखाने होते हैं, उनका प्रसाद शिर्क होता है… उनका पहनावा बिदत है, साड़ी-ब्लाउज में जिस्म झांकता है जो हराम है, माथे पर जहां बिंदी लगाते हैं वहां अंगारा रख कर वह जगह सुलगाई जायेगी… उनके त्यौहार भी बिदत ही हैं, होली में जिस्म पर जहां भी जरा सा रंग लग गया तो वहां की चमड़ी जलायी जायेगी।

आप Communal Muslim के तौर पर यह सब आत्मसात करते चले गए

आपने एक Communal Muslim के तौर पर यह सब आत्मसात कर लिया। आज आपका कोई अजीज़ हिंदू दोस्त आपको पूरा सलाम करे तो या तो आप उसे जवाब नहीं देंगे, या आदाब बोल देंगे या बहुत हुआ तो बस सलाम कह देंगे, क्योंकि ‘Walekum Salam’ कहना तो गैर-मुस्लिम के लिये अनुमति ही नहीं है। हालाँकि यह अभिवादन है जो सलामती की दुआ देता है, लेकिन आप अपने अजीज़ हिंदू दोस्त को वह दुआ भी देने को तैयार नहीं होते।

आप उसे किसी मज़ार का लाया तबर्रुक, फातिहा की हुई चीज खिलाइये, वह पूरे सम्मान के साथ उसे ग्रहण करेगा, लेकिन आप उसके प्रसाद को देख कर नाक-भौं सिकोड़ेंगे और कन्नी काट कर निकल जायेंगे। वह रास्ते में पड़ी मज़ार देख कर सिर झुका लेगा, लेकिन आप दिखावे के लिये भी इस तरह का कोई सम्मान नहीं दे सकते, क्योंकि वह ख़ुदा के लिये रिजर्व है… हालाँकि बहुत से Muslim मजारों के आगे झुके बगैर आगे नहीं बढ़ते, तब दर्शन बदल जाता है।

इसी तरह वह आपके त्यौहार में आपके साथ शरीक होकर आपका त्यौहार मना लेगा लेकिन आप उसके त्योहारों से दस कदम दूरी बना के रखेंगे कि यह बिदत है, कुफ्र है, शिर्क है… दिखावे के तौर भी साथ नहीं खड़े होंगे।

आपकी टोका-टाकी से इतिहास भरा पड़ा है

उनके धर्म का कौन बंदा क्या कर रहा, वे उस पर इन बातों को लेकर कभी टार्गेट नहीं करते, जबकि शमी, इरफ़ान पठान, जायरा, कैफ, सना जैसों के रूप में आपका तो इतिहास भरा पड़ा है टोका-टाकी से। मुलायम, लालू, मनमोहन टोपी पहन कर रोजा अफ्तार करते हैं तो आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, उल्टे मोदी जी के टोपी न पहनने पर आपको तकलीफ़ हो जाती है, जबकि हिंदू इन बातों को लेकर इन नेताओं पर नहीं टूट पड़ते… लेकिन ख़ुर्शीद आलम ‘Jai Shri Ram’ बोल दें या इनायत हुसैन हवन में बैठ जायें तो आप हंगामा खड़ा कर देंगे।

यह Communal unity जैसा शब्द मुसलमानों की तरफ से ही आया है, क्या अर्थ लेते हैं आप इसका? क्या यह One sided होता है? क्या इस देश में सेकुलरिज्म, सौहार्द, भाईचारा निभाने की सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर आती है, हम पर नहीं।

मत भूलिए कि Islamic Rules जिस परिवेश में बने थे, वहां सब मुस्लिम थे

यह ठीक है कि आपकी धार्मिक बाध्यतायें और वर्जनायें आपको ऐसा करने पर मजबूर करती हैं
लेकिन इस्लामिक रूल्स जिस परिवेश में बने थे वहां सब मुस्लिम ही थे
या यहूदी, ईसाई, जो कि एक ही कांसेप्ट की शाखायें हैं,
इसलिये वहां भले आप सामंजस्य बिठा लें लेकिन सांझी-संस्कृतियों वाले किसी भी देश में आपको अपने नियमों में,
अपने रुख में लचीलापन लाना पड़ेगा, तभी आप भारत जैसे देश में सही सामंजस्य बिठा पायेंगे
और Communal unity की बात दो-तरफा लग सकेगी।

इस मामले में आप सबसे ज्यादा Muslim आबादी वाले देश Indonesia से सबक ले सकते हैं
कि कैसे उसने अपनी संस्कृति के साथ Islam को आत्मसात किया है
और अमन और खुशहाली के साथ, बिना विवादों में पड़े तरक्की के रास्ते पर बढ़ रहा है
उन दूसरे Muslim मुल्कों के मुकाबले जिन्होंने Islam के साथ Arab culture को भी अपनाया
और आज या अंदरूनी संघर्षों के शिकार होकर जूझ रहे हैं
या उधार की तरक्की (आयातित श्रम व तकनीक) के बल पर ऐश-परस्ती की जिंदगी गुजार रहे हैं।

मेरा यह लेख न आपको नीचा दिखाने के लिये है न हिंदुओं के गुणगान के लिये,
बल्कि आपको यह बताने के लिये है कि क्यों और कैसे इस देश का आम हिंदू
आपके खिलाफ़ बनी धारणाओं का आसान शिकार हो जाता है।
क्योंकि वह आपकी हर हरकत को देख रहा है और समझ रहा है।
इस हक़ीकत को स्वीकारिये और बजाय चिढ़ने के थोड़ा आत्ममंथन कीजिये,
इससे पहले की अपने वोट बैंक का उल्लू सीधा करने के लिए
कोई राजनीतिक ताकत हमारी Communal unity के गुब्बारे को फोड़ दें।

~अशफाक़ अहमद

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