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रविवार, मई 16, 2021

Corona Infection Aur Kupamanduka (in Hindi)

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कोरोना संक्रमण से शुरू हुई धर्म और विज्ञान में दिलचस्प बहस

दुनिया भर में धर्मों और विज्ञान के बीच इस समय एक दिलचस्प मुठभेड़ चल रही है। तकरीबन सारे धर्म मानते हैं कि जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में हैं- “होइहि सोई जो राम रचि राखा”। Corona infection से यह समझ गड़बड़ा रही है। खास तौर से Tablighi Jamaat ने दुनिया भर के अपने केंद्रों में जिस तरह से व्यवहार किया है, उससे एक बहस शुरू हो गई है। यह शायद इसलिए भी संभव हुई है कि इस्लाम अपने मूल से सबसे मजबूती से जुडे़ रहने वाला धर्म है और उसमें भी Tablighi Jamaat संगठन के तौर पर बना ही इस घोषित उद्देश्य के साथ था कि मुसलमानों को पैगंबर मोहम्मद के जमाने की परंपराओं की तरफ लौट जाना चाहिए और उनकी शिक्षाओं के अनुकूल अपना जीवन बिताना चाहिए।

आज़ाद कबीर ने Tablighi Jamaat के बारे में अपने अनुभव साझा किए

एक बुद्धिजीवी आजाद कबीर ने अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि वह वर्षों तक Tablighi Jamaat के सदस्य रहे और एक स्थानीय इकाई के अमीर भी थे। उनके अनुसार, मरकज की शिक्षा मुसलमानों से प्राचीन और मिलावट रहित Islamic परंपराओं की तरफ लौट जाने की है। इसके तहत उन्हें अपने साथी मुसलमानों के साथ ईमानदारी, शराफत और भलमनसाहत के साथ व्यवहार करना चाहिए। जब मुसलमान शुद्ध Islamic रास्ते पर लौट आएंगे, तो अल्लाह का वादा है कि उन्हें खिलाफत सौंप दी जाएगी, यानी वे विश्व के शासक बना दिए जाएंगे। जब तक यह नहीं हो जाता, तब तक जमात के अनुसार मुसलमानों को राजनीति में भाग लेने की बात तो दूर, उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।

संगीत, शराब और नृत्य जैसे मनोरंजन तो मुसलमानों के लिए वर्जित हैं ही, आधुनिक शिक्षा भी उनके लिए हराम है, क्योंकि यह यहूदी और पाश्चात्य मूल्यों पर आधारित है और इसकी जगह Islamic शिक्षा दी जानी चाहिए। एक बार Islamic हुकूमत कायम होने के बाद काफिरों और औरतों को सख्त शरिया कानून के तहत लाया जाएगा। उनके साथ मोमिनों की मित्रता पूरी तरह निषिद्ध होंगी। बुतपरस्ती हराम है, इसलिए पहला मौका मिलते ही बुतों को नष्ट कर दिया जाएगा।

आजाद कबीर ने खुद के Tablighi Jamaat छोड़ने के दो कारण बताए

एक तो उन्हें संगीत प्रेम के लिए टोका-रोका गया और दूसरा, उन्हें एक काफिरों से दोस्ती करने पर कोसा गया, क्योंकि उन्हें तो मारने का हुक्म है। Corona पर भी Tablighi Jamaat बिना किसी लाग-लपेट के मानती है कि इसे अल्लाह ने इंसानों को, उसके दिखाए रास्ते से भटक जाने के कारण सजा देने के लिए भेजा है। इससे बचने का एक ही रास्ता है कि लोग बाजमात मस्जिदों में इकट्ठा होकर अपने गुनाहों की माफी मांगें। जमात के मुखिया मौलाना साद की आवाज में कई ऑडियो वायरल हुए हैं, जिनमें उसने ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ को मुसलमानों को बांटने का षड्यंत्र बताया है और उनसे मस्जिदों से दूर न जाने की अपील की है। उसने यह भी कहा है कि मस्जिद में होने वाली संभावित मृत्यु उनके लिए सबाब है।

बीमार पड़ने पर वह सिर्फ मुसलमान डॉक्टरों से इलाज कराने की सलाह देता है। यह अलग बात है कि मुसीबत बढ़ने पर उसने खुद को कहीं एकांतवास में डाल दिया है और सोशल मीडिया ऐसी सूचनाओं से भरा हुआ है, जिनमें उसके खुद एम्स के गैर-मुस्लिम डॉक्टरों से इलाज कराने के जिक्र हैं।

कोरोना संक्रमण से धार्मिकों की कूप-मंडूकता में आया बदलाव

दूसरी ओर, आठ हजार से भी ज्यादा मौतों वाले अमेरिका के ईसाई धर्मगुरु टोनी स्पेल के नेतृत्व में एक दर्जन से अधिक पादरियों ने घोषित किया है कि सरकार कुछ भी कहे, वे चर्च में रविवार की प्रार्थनाएं स्थगित नहीं करेंगे। वे शायद भूल गए कि दक्षिण कोरिया में Corona पहुंचा ही चर्च में वुहान से लौटी एक Corona संक्रमित भक्तिन की उपस्थिति से। बड़ी मुश्किल और सख्ती से दक्षिण कोरिया सरकार पूरे देश में चर्चों को बंद करके कोरोना को नियंत्रित कर पाई। और यह सब तब है, जबकि वेटिकन सिटी में पोप ने शुरुआती दौर में ही अपने सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए थे।

अयोध्या में रामनवमी के अवसर पर बहुत बड़ा मेला लगता है। इस बार नवरात्रि के शुरू होने के पहले ही Corona शुरू हो गया था। पहले तो महंतों ने मेला स्थगित करने से इनकार कर दिया। उनके अनुसार, अपने भक्तों की रक्षा तो भगवान राम स्वयं करेंगे, इसमें सरकार को चिंतित होने की जरूरत नहीं है। गनीमत है कि सरकार की सख्ती से उन्हें सद्बुद्धि आ गई।

लेकिन पूरे देश में सामूहिक आयोजनों में गोमूत्र पिलाते या हवन कराते
और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते चित्र दिखते ही रहे हैं।
कुछ दिनों पहले तक तिरुपति में दर्शन चलते रहने की खबरें हैं।
इसलिए किसी एक को निशाना बनाना उचित नहीं है।
मानव जाति ने इतिहास में इससे बड़ी मुसीबतों पर विजय पाई है और इस बार भी वही जीतेगी,
पर क्या इसके बाद धर्म से जुड़ी इस सोच में कुछ बदलाव आएगा?

आइंस्टीन Spinoza के ईश्वर में विश्वास रखते थे

कालजयी वैज्ञानिक आइंस्टीन से अक्सर छात्र पूछते थे कि क्या वह ईश्वर में विश्वास करते हैं?
आइंस्टीन का उत्तर होता कि वह Spinoza के ईश्वर में विश्वास करते हैं।
पुर्तगाली यहूदी मूल के दार्शनिक Baruch De Spinoza 17वीं सदी के एक बडे़ तर्कवादी बुद्धिजीवी थे।
उनका ईश्वर अपने अनुयायियों से कहता था कि खुद को कष्ट देकर मेरी उपासना मत करो।
मैंने दुनिया की तमाम खूबसूरत चीजें तुम्हारे लिए बनाई हैं, बाहर निकलो और उनका उपभोग करो।
तुमने मेरे घर के नाम पर जो कुरुचिपूर्ण स्थल बना रखे हैं, वहां मेरी उपासना के लिए जाना बंद करो।
मैं तो पहाड़ों, जंगलों, झरनों, नदियों, समुद्र तटों समेत प्रकृति के सुरम्य स्थलों में रहता हूं।
अपने को पापी मानकर कोसना बंद करो। मैं कौन हूं तुम्हारा फैसला करने वाला?
मैं सिर्फ तुमसे प्यार करता हूं। मुझसे माफी मांगना बंद करो।

अगर मैंने ही तुम्हें बनाया है, तो तुम जो भी हो, उसके लिए सजा कैसे दे सकता हूं?
अपने ही बच्चों के लिए अनंत काल तक जलाने वाले नरक को मैं कैसे गढ़ सकता हूं?
मैंने तुम्हें पूरी तरह से आजाद बनाया है, मेरी तरफ से न कोई पुरस्कार है और न ही कोई दंड।
बिना इस जीवन के बाद की चिंता किए अपने आसपास के जीव-जंतुओं और जीवन से प्यार करो।

Spinoza के ईश्वर सांस्थानिक ईश्वर से भिन्न हैं और उन्हें किसी धर्मगुरु की जरूरत नहीं। संभवत: Corona Spinoza के ईश्वर को कुछ मजबूत करे।

~विभूति नारायण राय (पूर्व आई॰पी॰एस अधिकारी)

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