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बुधवार, जुलाई 28, 2021

Dharmantaran Se Jannat Ki Hasrat

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पाकिस्तान के हंगू ज़िले के सिखों ने ये आवाज़ उठायी थी कि उनका ज़बरदस्ती धर्मांतरण (Dharmantaran) किया जा रहा है। इसके लिए उन पर बहुत दबाव बनाया जा रहा है कि वो सब इस्लाम कुबूल कर लें… हंगू जिले में गिने-चुने सिख हैं लेकिन वो भी इस ज़िले के लगभग सौ प्रतिशत इस्लामिक कट्टरपंथियों से बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है और पाक उच्चायोग से बात करने की बात कही थी।

Dharmantaran

पाकिस्तान की कुल आबादी लगभग बीस करोड़ के आसपास है।
और कुल आबादी का लगभग छियानबे प्रतिशत (96%) लोग मुसलमान हैं।
बीस करोड़ लोगों में छत्तीस (36) लाख के क़रीब हिन्दू रहते हैं।
पाकिस्तान में अट्ठाईस लाख के क़रीब ईसाई हैं और कुल बीस हज़ार सिख रहते हैं।
बीस करोड़ लोगों के बीच में सिर्फ और सिर्फ क़रीब साठ लाख के क़रीब ही ऐसे लोग हैं
जिनका धर्म इस्लाम नहीं है, बाक़ी सब इस्लाम के ही मानने वाले हैं।
लेकिन ये कुल 60 लाख “ग़ैर मुस्लिम” लोग पाकिस्तानी कट्टरपंथियों की आँख में खटकते रहते हैं
और ये इसी उधेड़बुन में लगे हैं कि कैसे इन सबको धर्मांतरण (Dharmantaran) कर के मुसलमान बना लिया जाय।

ये किस तरह की विचारधारा है?

जो इस क़दर प्यासी है अपने धर्म में लोगों को धर्मांतरण (Dharmantaran) के लिए?
ईसाइयत भी लोगों को अपने धर्म में धर्मांतरण (Dharmantaran) करने के लिए आतुर रहती है
लेकिन वो सेवा और लालच से इसे अंजाम देते हैं।
मगर मुसलमानों के साथ ऐसा क्या है जो उन्हें किसी भी तरह से दूसरों को अपने धर्म में लाने को मजबूर करता है?

आइये इसे विस्तार से समझते हैं।

Dharmantaran के मसले पर एक घटना का जिक्र करना यहां जरूरी है।

एक बार मैं अपनी पत्नी और अपने एक बेटे और अपने मुंह बोले “साले” के साथ ट्रेन के सफ़र पर था।
तीसरे दर्जे के AC के जिस कम्पार्टमेंट में हमारा रिजर्वेशन था उसी कम्पार्टमेंट में एक जमात सफ़र कर रही थी
(जमात एक तरह का इस्लामिक संगठन होता है) जिसका काम दूर-दराज़ के इलाकों में जा कर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना होता है।
जमात के लोगों को पहले तो लगा ही नहीं कि हम लोग मुसलमान है, क्योंकि मेरी पत्नी बुर्क़ा नहीं ओढ़ती।
लेकिन फिर कुछ देर की बातचीत के बाद वो लोग ये जान गए कि हम भी मुसलमान हैं
और फिर उनके साथ चलने वाले संगठन के बड़े लोगों का सारा ध्यान हम पर लग गया।
उन्हें लगा कि हम लोगों को देखकर कोई ये नहीं कह सकता है कि हम लोग ‘मुस्लिम’ हैं
इसलिए शायद हम लोगों को और ज्यादा मुसलमान बनने की ज़रूरत है।

हमें इस्लाम समझाना

इसलिए वो हमें इस्लाम समझाने लगे। वो हदीसें सुनाने लगे।
मुझे पर्दा और दाढ़ी की अहमियत समझाने लगे।
आखिर उनकी बातों से तंग आ कर मैंने इस्लाम पर बोलना शुरू किया।
मैंने हदीसें सुनायीं और इस्लाम के इतिहास पर बातें करने लगा
मेरी बातों से वो लोग इतने ज्यादा प्रभावित हो गए कि दूसरे डिब्बे में भी जो उनके लोग बैठे थे।
उनको भी कॉल कर के बुला लिया गया कि आ जाओ और ताबिश की बातें सुन लो।
ज़ाहिर सी बात है मैं उनके मन के इस्लाम की बात कर रहा था बिना किसी विरोध के।
जो उनके लिए बड़ी नयी बातें थीं। सारे नौजवान जमाती बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे।
कुछ देर बोलने के बाद मैं अपनी सीट पर वापस आ गया और फिर वो लोग आपस में मेरी बातों पर बहस करने लगे।

मेरा मुंह बोला साला उन्ही के पास बैठा रह गया तो उन लोगों ने उसे घेर लिया और उसे भी इस्लाम समझाना शुरू कर दिया गया।
वो बस उस समय हाँ-हाँ करता रहा। मुझे लगा कि अब ये उसके लिए कुछ ज्यादा हो रहा है।
तो मैंने कहा कि “अरे मौलाना साहब… ये हमारे साले साहब गुप्ता हैं।
आप इनसे थोड़ा कम उर्दू में बात कीजिये”। इतना सुनकर वो सारे एकदम अचंभित हो गए।
और उन सब के हेड मौलाना के आंखों में एक चमक सी आ गयी।
बाद में जब मैं टॉयलेट की तरफ गया तो जमात के हेड ने मेरा पीछा किया और टॉयलेट के पास मुझे पकड़ लिया
और मुझसे कहने लगा। “ताबिश साहब, हम तो जान ही नहीं पाए कि आपका साला मुसलमान नहीं है!”

दावा जन्नत का…

मैंने उन्हें समझाया कि वो मेरा परिवार है, और उसका परिवार मेरा परिवार है। तो मौलाना मुस्कुराए और मुझसे कहा कि “ताबिश साहब, फिर तो कौम के लिए आप बहुत अच्छा काम कर सकते हैं”। “आपको पता है कि अल्लाह मियां एक काफ़िर को धर्मांतरण (Dharmantaran) कर के मुसलमान बनाने का कितना बड़ा सवाब देता है?” मैंने कहा कि “अगर मेरा साला मुझ पर भरोसा करता है तो मैं उसके साथ ये करूँ कि उसको धीरे-धीरे धर्मांतरण (Dharmantaran) कर के मुसलमान बना दूं?”

कहने लगे “इसमें हर्ज क्या है? आपको पता है, नेक और सही रास्ते पर लगा कर आप उसको कितने गुनाहों से बचा सकते हैं? आप क्या चाहेंगे कि आप जिसे इतना चाहते हैं वो आपके सामने जहन्नम की आग में फ़ेंक दिया जाए?” मैंने उनसे पूछा “कि क्या आप ये दावे से कह सकते हैं कि आप जन्नत जायेंगे?” कहने लगे “नहीं, मगर मैं इस बात का दावा कर सकता हूँ कि अगर आपने एक काफ़िर का धर्मांतरण (Dharmantaran) कर के मुसलमान बना लिया तो आप जन्नत में जरूर जायेंगे”।

इंसान या मुसलमान

तब तक मैं गुस्से से भर चुका था। मैंने उनसे कहा- “मौलाना साहब आप मुझे बहुत अच्छे इंसान लगे, कुछ देर पहले हुई आपकी बातें मुझे पसंद आई थीं, लेकिन अभी-अभी ये बात जो आपने कही है इस वजह से मुझे आपसे घिन आने लगी है। सुनो मौलाना, आप जैसे लोग इंसान नहीं होते हैं। वो बस मुसलमान होते हैं और रिश्तों की समझ तो आपको बिलकुल होती ही नहीं आपको पता है एक बात? अगर मैं अपने मुंह बोले साले से प्यार करता हूँ तो मैं उसके कहने पर हिन्दू बन सकता हूँ, मगर उसको कभी धोखे से मुसलमान बना कर मैं ज़िंदा नहीं रह पाऊंगा। मौलाना, आप क्या जानें मोहब्बत? जाईये… चुपचाप अपनी सीट पर बैठिये”।

मक्खन बाज़ी

मौलाना साहब एकदम चुप हो गए, वो समझ गए थे कि उनके इस्लाम की मेरे लिए क्या अहमियत है मैं जब अपनी सीट पर वापस आया तो वो मुझे मक्खन लगाने लगे मगर फिर मैंने उनसे बात ही नहीं की जब उनका स्टेशन आया तो जमात के सारे लोग मुझसे हाथ मिला कर जाने लगे तो अंत में मौलाना ने हाथ मिलाया और कहा कि ट्रेन से बाहर चलिए, मेरा बेटा स्टेशन पर आया है मैं चाहता हूँ कि आप उससे मिलें” मैंने कहा “नहीं… मुझे अब किसी से नहीं मिलना है, आप आगे से इसका ख़याल रखियेगा, क्योंकि इस हरकत से आपने इस्लाम नहीं फैलाया है बल्कि अपनी इस्लामिक जमात के लिए एक और धुर-विरोधी पैदा कर दिया है” मौलाना चुपचाप नज़र झुका कर ट्रेन से उतर गए।

चस्का Dharmantaran से जन्नत का

मैं अपनी सीट पर वापस लेट गया और नीचे अपने साले को अपने बेटे के साथ खेलता हुआ देख रहा था। कोई उन्हें देखकर जान ही नहीं सकता था कि मेरे बेटे और मेरे साले में से किसका कौन सा धर्म है! मैं बहुत देर तक उसे देख कर सोचता रहा कि उस मौलाना ने शायद ही मेरे साले को इंसान की तरह जानने की कोशिश की हो उसने शायद ही ये सोचा हो कि जो इंसान मेरे परिवार का हिस्सा है उसमें क्या ख़ास बात होगी और उसे थोड़ा और जाना जाया, उस मौलाना को मेरा साला सिर्फ़ और सिर्फ़ एक “ग़ैर मुस्लिम” दिखे, जिसे इस्लाम में धर्मांतरण (Dharmantaran) कर लेना चाहिए। और जन्नत पा लेनी चाहिए।

ये किस नज़र से दुनिया को देखते हैं?

समझ में नहीं आता कि ये किस तरह के रोबोटिक लोग होते हैं? और ये किस नज़र से दुनिया देखते हैं? इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया था! बाद में मेरे साले ने मुझसे पूछा कि क्या हुआ था? क्योंकि उस समय मौलाना के ऊपर उसने मेरा गुस्सा देख लिया था! मैंने उसको सब बता दिया तो वो कहने लगा “क्या हुआ! बोल देते कि मैं मुसलमान हूँ” मैंने कहा “क्यों, बोल देता कि तुम मुसलमान हो? आखिर क्यों, ऐसी बातों को टाला जाए? क्यों नहीं? ये लोग बर्दाश्त कर सकते हैं कि एक “ग़ैर मुसलमान” भी मेरा परिवार हो सकता है?
क्यों नहीं, इनकी हिम्मत पड़ती है कि जाकर शाहरुख़ खान को ये बोलें
कि अपनी पत्नी गौरी को वो मुसलमान बना ले?
ये लोग आम आदमियों को ही क्यों टारगेट करते हैं
और आम आदमियों के शोषण में ये अपनी जन्नत ढूंढते हैं”।

Dharmantaran के पीछे छुपी जन्नत की हसरत

ये घटना आज़ से करीब 6 साल पुरानी है मगर बहुत कीमती घटना है जिससे ये समझा जा सकता है कि इस सब के पीछे क्या मानसिकता काम करती है? मानसिकता कुछ और नहीं बस “जन्नत” है! मौलानाओं के हिसाब से एक इंसान के धर्मांतरण (Dharmantaran) के पीछे “जन्नत” पक्की हो जाती है। अब जितने भी नौजवान उस जमात में होंगे उन सब को यही सिखाया और पढ़ाया जाता है और फिर वो इसी प्रचार को आगे बढ़ाते हैं और इसी तरह से ये सारा समाज दूषित होता चला जाता है। यहाँ भारत में तो इनकी सोच पर लगाम होती है मगर पाकिस्तान में इनको खुला मैदान मिल गया है जहाँ ये जितना चाहें अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करें और जिस हद तक भी जाना चाहें उस हद तक जाएँ ऐसे ही इन्होने हर इस्लामिक देश में किया है।

और इतने आस-पास इतने मुसलमान होने पर भी चैन सिर्फ़ इसलिए नहीं मिल रहा है क्योंकि किसी गैर मुस्लिम को धर्मांतरण (Dharmantaran) से इनकी जन्नत की सीट पक्की हो जाती है। इनकी जन्नत की इस चाहत ने ही सारी दुनिया को नर्क बना दिया है मगर ये हवाई भूख इनकी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है।

पाकिस्तान की इस्लामिक जमात के लिए गैर-मुस्लिम जन्नत का टिकट हैं, इसलिए ये लोगों को धर्मांतरण के लिए बाध्य करते हैं।

पाकिस्तान के हंगू जिले में ये जो गिने-चुने सिख हैं वो इन कट्टरपंथियों के लिए “जन्नत” का टिकट हैं। और इस टिकट को भुनाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं इनकी सोच और समझ इस हद तक दूषित हो गई है कि आम इंसान और दूसरी कौमें शायद ही इसे कभी समझ सकें। ये जन्नत पाने के लिए ही चर्च में बम बाँध कर फट जाते हैं और मासूमों को ट्रक से रौंद देते हैं। ये भूल जाते हैं कि इनके ऊपर पहुँचने पर इन्हें अपनी जन्नत में खून की नदियाँ मिलेंगी दूध की नहीं!

~ताबिश सिद्धार्थ


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