Existence of GOD | ईश्वर, आस्था और विज्ञान पर तार्किक पुस्तक

0
107
Existance-of-GOD
God's Existence

Existence of GOD- यह पुस्तक मूलतः धर्म, ईश्वर और इस ग्रह पर इंसान के अवतरण को तर्क की कसौटी पर परखने और इस पृथ्वी से बाहर हमारे लिये क्या-क्या संभावनायें हो सकती हैं इस विषय पर बात करती है।

इंसान ने पृथ्वी पर किस तरह जीवन शुरू किया? और किस तरह आगे बढ़ते हुये समाज बसाये? किस तरह इंसानों के बीच धर्मों की ज़रुरत महसूस हुई? और फ़िर कैसे उसने उन भगवानों, खुदाओं और आस्थाओं को जन्म दिया? जो आज के उपलब्ध ज्ञान और तर्क के आगे धराशायी हो जाते हैं।

हम जिस दुनिया को जानते हैं, देखते हैं, वो थ्री डायमेंशनल है और इससे बाहर हम कुछ नहीं समझ सकते जबकि इससे बाहर ढेरों तरह की संभावनायें हो सकती हैं। यह यूनिवर्स सेल्फ मेड है या इसे किसी ने बनाया है? यह जानने का हमारे पास कोई साधन नहीं, लेकिन कई संभावनायें हैं जिन्हें हम टटोल सकते हैं।

कैसा हो कि अगर यह मान लिया जाये कि वाकई कोई है जिसने एक प्रोग्राम की तरह इसे डिजाइन किया है तो तमाम तरह की आस्थाओं से परे विज्ञान और टेक्नॉलोजी के नज़रिये से वह कैसा हो सकता है?

Existence of GOD का संक्षिप्त वर्णन

ज्यादातर दुनिया एक सरल से तर्क पर काम करती है कि यदि कोई रचना है तो उसका रचनाकार भी होना चाहिये और इसी तर्क के आधार पर सृष्टि रचियता की ईश्वर के रूप में कल्पना की जाती है। अब चूंकि यह कल्पना एक इंसान करता है जिसका ज्ञान और जिसकी समझ इस ब्रह्माण्ड की अपेक्षा बेहद सीमित सी है तो वह ठेठ इंसानी स्वभाव को ही उस ईश्वर पर लागू कर देता है… मतलब कि उनका ईश्वर प्रशंसा और गुलामी से खुश होगा, हुक्म उदूली से नाराज हो जायेगा, गुस्सा होगा तो बहुत बुरा व्यवहार करेगा, सजायें देगा, वैसे यह उसे बहुत प्यार करने वाला है और बहुत रहम वाला भी बना देते हैं।

उनकी यह सारी अनुभूतियां दरअसल न्यूरान्स में होने वाले प्रतिक्रियाओं पर आधारित हैं, अगर आप यह अनुभूति उस रचियता के साथ जोड़ते हैं तो फिर स्थापित तथ्य के हिसाब से उसके पास दिमाग जैसा अंग होना चाहिये जहाँ यह प्रतिक्रिया होती हैं और अगर दिमाग है तो फिर शरीर भी होना चाहिये। लेकिन अब मज़े की बात यह है कि ज्यादातर लोग उस पर इंसानी फीलिंग्स अप्लाई करने के बाद भी उसे निराकार की संज्ञा देते हैं, जबकि यह दोनों बातें विरोधाभासी हो जाती हैं।

तर्क उस ईश्वर पर भी लागू होता है!

इसके सिवा वे इस पर भी कोई जवाब नहीं देते कि रचना है,
तो रचनाकार होना जरूरी है वाले तर्क के हिसाब से ईश्वर के अस्तित्व को स्थापित
करते वक्त यही तर्क उस ईश्वर पर भी तो लागू होता है क्योंकि वह खुद भी एक रचना है
तो फिर उसका रचनाकार कौन है और अगर कोई उसका भी रचनाकार है तो फिर वह सर्वशक्तिमान कैसे हुआ?
थोड़ा इसे गहराई से समझेंगे तो इस एक बिंदु पर यह समझ में आयेगा कि कोई ईश्वर है या नहीं,
दरअसल इंसान हकीकत में इतना सक्षम नहीं है कि इस बारे में अंतिम फैसला कर सके
क्योंकि अंतिम फैसले के लिये सब कुछ जान चुका होना जरूरी है,
आप अपनी आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं ले सकते
और फिर लोग यूनिवर्स के बारे में जानते ही कितना हैं?

बस इतना है कि थोड़े व्यवहारिक हो कर सोचेंगे तो ये समझ सकते हैं
कि अगर कोई इस सृष्टि का रचियता हुआ भी तो कम से कम वैसा तो नहीं होगा
जैसा की लोगों ने उसकी रूपरेखा खींच रखी है।
यह तो इंसान की कल्पना से निकला इंसान जैसा ही अस्तित्व है, जिसमें ढेरों त्रुटियाँ हैं
जो इंसान की सीमित समझ के हिसाब से अवश्यंभावी है तो फिर अगर हुआ तो कैसा हो सकता है?

इस बारे में ज्यादा जानने के लिए Amazon पर Existence of GOD का पेपर बैक या फ़िर किंडल संस्करण खरीद सकते है।
जिसका लिंक नीचे दिया है।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.