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रविवार, मई 16, 2021

The four horsemen of atheism (in Hindi)

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The four horsemen of atheism

इक्कीसवीं सदी में विवादास्पद व्याख्यानों व किताबों के लेखक हैं- (ऊपर देखें: Anti-Clockwise) रिचर्ड डॉकिन्स, क्रिस्टोफ़र हिचेन्स, डैनियल डैनेट, एवं सैम हैरिस। इन्हें The four horsemen of atheism कहा जाता है। धर्म और धार्मिक विश्वास के इन प्रमुख आलोचकों के विचारों में गज़ब का आत्मविश्वास है। आस्तिक मान्यताओं की आलोचना और इसके मूल और विकास की प्रस्तावित व्याख्याओं में ये प्राकृतिक विज्ञान का भरपूर उपयोग करते हैं। इनका मानना है कि “एक विश्वास को केवल तभी प्रमाणित किया जा सकता है जब यह पर्याप्त प्रमाणों पर आधारित हो”। इनका कहना हैं कि धर्मनिरपेक्ष, नैतिकता और वैज्ञानिक खोजों के आधार पर एक संतोषजनक गैर-धार्मिक जीवन जीना बिलकुल संभव है।

What are the four horsemen?

रिचर्ड डॉकिंस:

एक नास्तिक हैं और “भगवान ने ये दुनिया बनाई” मत के विशुद्ध आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। 2006 में प्रकाशित ‘द-गॉड-डिलुज़न (“भगवान का भ्रम”) में उन्होंने कहा है कि किसी दैवीय विश्व-निर्माता के अस्तित्व में विश्वास करना बेकार है और धार्मिक आस्था एक भ्रम मात्र है। जनवरी 2010 तक इस किताब के अंग्रेज़ी संस्करण की 2,000,000 से अधिक प्रतियाँ बेची जा चुकी हैं और 31 भाषाओं में इसका अनुवाद किया जा चुका है।

क्रिस्टोफर हिचेन्स

क्रिस्टोफ़र हिचन्स का जन्म 13 अप्रैल 1949 को पॉर्ट्स्मथ, हैम्पशायर, इंग्लैंड में हुआ था और मृत्यु 15 दिसम्बर 2011 (उम्र 62) ह्यूस्टन, अमेरिका में। उनका पूरा नाम क्रिस्टोफ़र एरिक हिचन्स था। वह पेशे से लेखक, पत्रकार और साहित्यिक आलोचक थे। लोग उन्हें विशेष रूप से धर्म के प्रखर आलोचक के रूप में जानते हैं। उन्हें नव-नास्तिकता के प्रमुख चार लोगों में से एक भी माना गया है। पश्चिमी देशों के प्रमुख राजनीतिक विचारक भी इनका समर्थन करते थे। उन्होने अपने जीवन काल में 18 से ज्यादा पुस्तकें लिखी थी। उन पुस्तकों में से मदर टेरेसा पर लिखी पुस्तक (The Missionary Position) और धार्मिक विश्वास की आलोचना करने वाली पुस्तक (God Is Not Great) पर सबसे ज्यादा विवाद झेलना पड़ा था।

क्रिस्टोफ़र anti-theist थे

क्रिस्टोफ़र हिचन्स ईश्वर विरोधी विचार रखते थे, और सभी धर्मों को हानिकारक और सत्ता का औज़ार मानते थे। उन्होने मुक्त चिंतन और वैज्ञानिक ख़ोज के पक्ष में अपने तर्क दिये, और धर्म को राजनीति से अलग रखने पर ज़ोर दिया। उन्होने कहा कि “जो दावा बिना सबूत के किया जा सकता है, तो उसे बिना सबूत के ख़ारिज़ भी किया जा सकता है”। सन 2010 में न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी में हुए एक साक्षात्कार के दौरान उन्होने कहा कि वो बच्चों के ‘खतना’ करने के खिलाफ़ हैं। The Independent (लंदन) के पाठकों द्वारा यह पूछे जाने पर कि वे “मुख्य बुराई की जड़” किसे मानते हैं? हिचन्स ने उत्तर दिया था “यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम”।

डैनियल डेनेट

डैनियल डेनेट का जन्म 28 मार्च 1942 को बोस्टन, मैसाचुसेट्स अमेरिका में हुआ था। डेनेट के पिता का नाम डैनियल क्लेमेंट डेनेट जेट और माँ का रूथ मारजोरी (नी लेक) था। और डेनेट का पूरा नाम डैनियल क्लेमेंट डेनेट (तृतीय) था। वह दार्शनिक, लेखक और वैज्ञानिक थे। वह एक नास्तिक और धर्म निरपेक्षवादी भी थे। डेनेट को उन चार प्रमुख दार्शनिकों में से एक माना जाता है, जिन्होने ने नव-नास्तिकता का आगाज किया है। डेनेट ने अपने बचपन का हिस्सा लेबनान में बिताया था। जब वह पाँच वर्ष के थे, तभी एक संदिग्ध विमान दुर्घटना में पिता की मृत्यु उपरांत उन्हें माँ के साथ मैसाचुसेट्स वापस जाना पड़ गया था। डेनेट को 11 साल की उम्र में एक समर कैंप के दौरान यह पता चला कि वह एक दार्शनिक हैं।

सैम हैरिस:

पूरा नाम Samuel Benjamin Harris, जन्म: 9 अप्रैल 1967 एक अमेरिकी तंत्रिका वैज्ञानिक, लेखक और अनीश्वरवादी है। इन्होंने किताबें लिखने के अलावा टी.वी कार्यक्रमों में कई बार नास्तिकता के पक्ष में और तर्क प्रमाणित वैज्ञानिक धारणाओं का सहारा लेकर धर्म का विरोध किया है। 1967 में पश्चिम तटीय शहर लॉस एंजलिस में अलग-अलग धर्मों के पालन करने वाले माता-पिता के यहाँ जन्मे हैरिस ने 1986 में स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। वहाँ उन्हें मादक द्रव्यों की लत लगी और आध्यात्म से भी नाता जुड़ा। वे अपनी बी.ए की डिग्री छोड़कर भारत आ गए। 11 साल बौद्ध और हिन्दू गुरुओं का निकटस्थ रहने के बाद 1997 में अमेरिका वापस लौट गए। सन् 2000 में उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की। उनकी किताबों में से एक है – द एंड ऑफ़ फ़ेथ


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