Ishwar hai ya nahin, मुझे नहीं मालूम

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Ishwar hai ya nahin? मुझसे यह सवाल जब भी पूछा जाये तो मैं यही कहूंगा कि मैं ये कैसे बता सकता हूँ…? न मुझे कभी उसके होने का प्रमाण मिला और न ही न होने का। हो भी सकता है… नहीं भी हो सकता।

सीधी सी बात है कि क्योंकि मैं उसे जानता नहीं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ… इसके अलावा जब कोई धार्मिक शख्स मुझसे यह जिद करता है कि मैं साबित करूँ कि वह नहीं है… यानि दूसरे शब्दों में सब कुछ कुदरती तौर पर वजूद में आया, तो यह मेरे लिये मुमकिन नहीं…

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इसका कोई प्रमाण आपके पास भी नहीं है कि ये दुनिया किसी Ishwar ने बनाई है!

और यकीन कीजिये कि अगर मैं कहूँ कि आप साबित कीजिये कि यह सब किसी Ishwar ने बनाया तो यकीन मानिए कि इसका कोई प्रमाण आपके पास भी नहीं है। सिवा उन धार्मिक मान्यताओं के, जिनके साथ पहली अनिवार्य शर्त जुड़ी होती है… मानने की।

मानने और जानने में बड़ा फ़र्क है!

यह तो सभी जानते होंगे कि मानने और जानने में कितना फर्क होता है। धर्म सिर्फ मानने की बुनियाद पर टिका होता है… जो पैदा होते ही आपको माँ-बाप ने बता दिया… जो आपकी किताबों ने आपको पढ़ा दिया, आप उसे ही आखिरी सच मान लेते हैं और जीवन भर उस ‘माने हुए सच’ को डिफेंड करने में लगे रहते हैं।

जानने के नाम पर आप अपनी धार्मिक किताबों में से वो विज्ञान ढूंढ लाते हैं जो असल में होते नहीं, बस दिखते हैं। सभी धार्मिक किताबों में ज्यादातर वे सिंबोलिक बातें लिखी हैं जो हर दौर में उपलब्ध जानकारी के अनुसार अपने हिसाब से तोड़ी-मरोड़ी जा सकती हैं।

एक बेहद सिंपल उदाहरण देता हूं… कॉपरनिकस, ब्रूनो, गैलीलियों से पहले तक यही मान्यता थी कि धरती चपटी है, केन्द्र में है और सूरज, चांद, सितारे उसके इधर-उधर होते हैं, जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता था।

कुरान में मदार (कक्ष) बाद में लिखा गया है!

Ishwar

इसी चीज को क़ुरान में लिखा गया कि यह अपना सफर पूरा कर रहे हैं… बाद में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ब्रैकेट में ‘मदार’ (कक्ष) लिख दिया गया, जिससे उस लाईन का अर्थ हो गया कि यह सब अपने कक्ष पर परिक्रमा कर रहे हैं… हालाँकि मूल लाईन में ‘मदार’ जैसे किसी शब्द का जिक्र नहीं।

आपको क़ुरान के ट्रांसलेशन में ऐसे ढेरों शब्द मिलेंगे जो ब्रैकेट में हैं, जबकि यह मूल आयत में नहीं। यह पढ़ने वालों की सहूलियत के लिये हैं कि किससे, किस विषय में क्या कहा जा रहा है… और यहां यह चीज भी अपने पक्ष में विज्ञान सम्मत साबित करने के लिये इस्तेमाल कर ली गयी।

बहरहाल… मानने और जानने में ऐसी ही चीजें आपके सामने आती हैं और आपकी गाड़ी पटरी से उतर जाती है।

मुझे नहीं पता कि इस जहां का मालिक कोई Ishwar hai ya nahin लेकिन मान लेता हूं कि है, तो एक पल के लिये कल्पना कीजिये कि जिसने इतनी जटिल प्रकृति बना रखी है… आधुनिक मानव के पांच हजार साल के इतिहास में हम यहां तक पंहुच पाये हैं और अभी अगले पांच हजार साल में जहां पंहुच पायेंगे…

उतना सब हो सकता है कि वह सब उस Ishwar के ज्ञान का शायद एक प्रतिशत से भी कम हो… तो क्या आप उसके कुल ज्ञान का कोई अंदाजा लगा सकते हैं? इस पिद्दी से ग्रह की एक Species हो कर, जो अभी अपने सोलर सिस्टम को भी ठीक तरह से समझ नहीं पाई है… किसी नजदीकी ग्रह तक नहीं पंहुच पाई है… आप उस ईश्वर के सोचने-समझने की शक्ति का कोई अंदाजा लगा लेंगे?

बड़ा फनी लगता है, जब कोई पूछता है कि Ishwar की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है?

बड़ा फनी लगता है जब मुझसे कोई बंदा पूछता है कि क्या आप बता सकते हैं कि Ishwar की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है? मने Ishwar रोहित शेट्टी है कि गोलमाल, सिंघम, चेन्नई एक्सप्रेस के रूप में आप उसकी सारी रचनाओं से भली-भांति परिचित हैं। आप जैसों को बस एक सहज जवाब दिया जा सकता है कि चेन्नई एक्सप्रेस रोहित की श्रेष्ठ रचना है।

किसी ने कहा कि जैसे हम कंप्यूटर बना कर उसकी हर छोटी-छोटी चीज का ध्यान रखते हैं तो Ishwar भी रखता है… मतलब आप उसे जानते नहीं लेकिन अपनी इंसानी बुद्धि उस पे अप्लाई कर दी कि जैसे आप करते हैं… Exactly वह भी वैसे ही करेगा।

थोड़ा सोचिये… कैसा कार्टून जैसा बना रखा है Ishwar को आपने… एक तरफ राजा है, एक तरफ जादूगर है, एक तरफ जल्लाद है… अपनी इंसानी सोच की लिमिटेशन के साथ अपनी हर कल्पना उस पर अप्लाई कर दी और समझ लिया कि सौ ग्राम के दिमाग से आपने Ishwar के दिमाग को पढ़ लिया… उसकी शक्तियों, क्षमताओं और सोचने-समझने की बाउंड्रीज को जान लिया…

हम तो चलो, सिरे से उसे जानते ही नहीं पर आप मानने की धुन में, जानने के पता नहीं कौन कौन से दावे किये बैठे हैं… वह अगर है भी तो तय जानिये कि आप उसे अपनी कल्पनाओं में नहीं समेट पायेंगे।

और हाँ… मेरा न उसके होने पे कोई दावा है और न ही न होने पे। यह सब इसलिये लिखा कि कुछ आप मुझे समझ सकें और कुछ उस Ishwar को, जिसे समझने का दिन रात दावा करते हैं।

~अशफाक़ अहमद

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