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Manyata aur Andhvishwas kya hai?

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Manyata | यानि जिसका कोई वैज्ञानिक आधार न हो।

विज्ञान हमें वह वास्तविकता दिखाता है, जो साबित कर सकते हैं।
जबकि आप किसी Manyata aur Andhvishwas को साबित नहीं कर सकते।
Manyata- समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती हैं।
कई बार स्थान बदलने पर एक दूसरे से नितांत विपरीत मान्यताएं भी प्रचलन में पायीं जातीं हैं,
क्योंकि उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता इसीलिये ये वास्तविकता नहीं – Manyata हैं।

Andhvishwas | व्यक्ति को मानसिक विश्राम व सुविधा देता है।

असल में Andhvishwas व्यक्ति को मानसिक विश्राम व सुविधा देता है।
मनुष्य की प्रवृत्ति ऐसी है कि वो वही विश्वास करना चाहता है जो उसके अनुकूल और सुविधाजनक हो,
ये कोई आवश्यक नहीं कि वो सत्य भी हो…
वास्तविकता जो कि निश्चित रूप से सत्य है, असुविधाजनक भी हो सकती है।
तभी झूठ का अस्तित्व भी है क्यों कि अक्सर लोग झूठ पर विश्वास करते हैं।
जबकि झूठ पर तो आपको हमेशा अंधविश्वास ही करना पड़ेगा, क्यों कि यदि आँख खोल ली तो आपको पछतावा होगा।

‘सत्य’ तो सत्य है आप विश्वास करो या न करो।

सत्य पर विश्वास करना कोई जरूरी नहीं, सत्य तो सत्य है आप विश्वास करो या न करो।
वास्तविकता तो वास्तविकता ही रहेगी आपके विश्वास करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं और सत्य को विश्वास की आवश्यकता नहीं।
जैसे कि अग्नि प्रत्यक्ष दिखाई देती है और उसकी सत्यता ये है कि वो जलाती है
आप चाहे विश्वास करो या न करो वो जलाएगी ही।

अन्धविश्वासी स्वयं पर विश्वास नहीं करते बल्कि हमेशा ऐसा सुना है, लिखा है, पढ़ा है, फलाने ने कहा है या मान्यता है और साथ ही कि हम तो मानते हैं। असल में वो जानते नहीं है, बल्कि मानते हैं। सही बात तो ये है कि जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसको जाना तो जा ही नहीं सकता, केवल माना जा सकता है, आँख बंद करके मान लो बस, सवाल पूछने का अधिकार नहीं है तुम्हें और यदि सवाल पूछने भी हैं तो केवल मान्यता के बारे में ही पूछना परन्तु शक करने की गुंजाइश नहीं है।

धर्म यही तो कहता है कि जो शास्त्रों में लिखा है उसे मान लो, जानने की कोशिश मत करो और शक मत करो यदि सवाल भी पूछने हैं तो केवल शास्त्रों से सम्बंधित ही पूछो।

Manyata aur Andhvishwas एक तरह से विश्वास करने का दुराग्रह है…

जहाँ भी आपको विश्वास करने का दुराग्रह किया जाये तो सावधान हो जाना,
और शक भी करना कि कहीं आपकी आँखों पर विश्वास की पट्टी बांधकर धोखा तो नहीं दिया जा रहा,
याद रखना धोखा वही देते हैं जिन पर आपने विश्वास किया है।

धर्म, ईश्वर, शास्त्र, ज्योतिष, परलोक, अलौकिक चिकित्साएँ, मान्यताएं ये सभी विश्वास का आग्रह करती हैं और वो भी अंधे विश्वास का, शक न करना और उस पर भी तुर्रा ये कि यदि शक किया तो ये काम नहीं करेंगी।

विज्ञान कभी आकर आपसे नहीं कहेगा कि मुझे मानो, वो तो आपको मानना पड़ेगा ही, और कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है।
एक महत्वपूर्ण बात और भी आपने इन अन्धविश्वासी लोगों से सुनी होगी
कि इनके टोने-टोटके, मान्यताएं उन पर ही लागू होते हैं जो इन पर विश्वास करते या मानते हैं, सब पर नहीं।
देखो कितना अच्छा रास्ता है बच निकलने का, तुम्हारे ऊपर ये लागू नहीं हो रहा या असर नहीं हो रहा क्यों कि तुम मानते नहीं हो।
तो फिर झगड़ा ही क्या है मानना छोड़ दो सारी परेशानी खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगी।

सारे धर्म सत्य को ही स्थापित करने में जुटे हैं और स्वयं को सत्य बता रहे हैं
ईश्वर की अवधारणा के सहित और रहित कोई फर्क नहीं पड़ता।
सचाई तो ये है कि एडवोकेसी तो असत्य की होती है सत्य तो सत्य है और जितने धर्म हैं सब एडवोकेसी में ही लगे हैं।
परन्तु आग को मानो या न मानो वो तो जलायेगी ही और आग को जान सकते हो तुम मानने की जरूरत नहीं।

~स्वामी बालेंदु


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