Mohammed Sharif | समाज सेवी पद्म श्री शरीफ़ चचा

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इंसानियत को कुचलने के लिए भीड़ की जरूरत है। इंसानियत को बचाने के लिए आपको अकेले चलना होता है। भीड़ आपको अकेला छोड़ देती है। फरवरी, 1992 अयोध्या का मोहल्ला खिड़की अली बेग। यहां रहने वाले Padma shri Mohammed Sharif Chacha (मो॰ शरीफ़) का बेटा रईस सुल्तानपुर गया था। वह दवाएं बेचने का काम करता था। रईस वापस नहीं लौटा। शरीफ़ चचा अपने बेटे को एक महीने तक ढूंढते रहे। एक दिन पुलिस ने उन्हें उनके बेटे के कपड़े लौटाए। साथ में यह खबर भी दी कि उनका बेटा मारा जा चुका है। उसकी लाश सड़ गई थी, जिसका निपटारा कर दिया गया है।

Sharif Chacha के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके मन में टीस रह गई कि वे अपने बेटे का ढंग से अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए। यह सोच कर बेटे का दुख और बढ़ गया कि जिस बेटे का बाप जिंदा है, उसकी लाश लावारिस पड़ी रहे और मिट्टी न नसीब हो!

एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस वाले नदी में एक लाश फेंक रहे हैं। शरीफ़ Chacha को बेटे की याद आई। ‘इसी तरह उन्होंने मेरे बेटे की लाश भी नदी में फेंक दी होगी’।

इसी रोज शरीफ़ Chacha (শরীফ চাচা) ने प्रण किया कि ‘आज से मैं किसी लाश को लावारिश नहीं होने दूंगा। मेरे बेटे को मिट्टी नसीब नहीं हुई, पर मैं किसी और के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा’।

यहां से जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने मानवता की बेहद खूबसूरत कहानी लिखी। शरीफ़ तबसे चुपचाप तमाम हिंदुओं और मुसलमानों को कंधा दे रहे हैं।

साइकिल मैकेनिक से मशहूर समाज सेवी बनने तक का सफर

शरीफ़ Chacha (Mohammed sharif) पेशे से साइकिल मैकेनिक थे, लेकिन वे इंसानियत और प्रेम के मैकेनिक बन बैठे। तबसे अस्पतालों में, सड़कों पर, थाने में, मेले में… जहां कहीं कोई लावारिस लाश पाई जाती, शरीफ़ चचा के हवाले कर दी जाती है। वे उसे अपने कंधे पर उठाते हैं, नहलाते धुलाते हैं और बाइज्जत उसे धरती मां के हवाले कर देते हैं। मरने वाला हिंदू है तो हिंदू रीति से, मरने वाला मुस्लिम है तो मुस्लिम रीति से।

Mohammed Sharif बने मुर्दों के मसीहा

शरीफ़ चचा पिछले 28 सालों से लावारिसों मुर्दों के मसीहा बने हुए हैं
और अब तक करीब 5500 लाशों को सुपुर्द-ए-खाक कर चुके हैं।

शरीफ़ चचा ने कभी किसी लावारिस के साथ कोई भेदभाव नहीं किया।
उन्होंने जितने लोगों का अंतिम संस्कार किया, उनमें हिंदुओं की संख्या ज्यादा है।
उन्होंने हमेशा सुनिश्चित किया कि मरने वाले को उसके
धर्म और परंपरा के मुताबिक पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाए।

मोहम्मद शरीफ़ (Mohammed sharif) का कहना है कि दुनिया में न कोई हिंदू होता है,
न कोई मुसलमान होता है, इंसान बस इंसान होता है।
वे कहते हैं कि ‘हर मनुष्य का खून एक जैसा होता है,
मैं मनुष्यों के बीच खून के इस रिश्ते में आस्था रखता हूं।
इसी वजह से मैं जब तक जिंदा हूं।
किसी भी इंसान के शरीर को कुत्तों के लिए या अस्पताल में सड़ने नहीं दूंगा’।

शरीफ़ चचा भी बरसों से अकेले ही चले जा रहे हैं। उनके आसपास के लोगों ने उनसे दूरी बना ली, लोग उनके पास आने से घबराने लगे। लोग उन्हें छूने से बचने लगे, लोगों ने करीब-करीब उनका बहिष्कार कर दिया। परिवार ने कहा तुम पागल हो गए हो। शरीफ़ चचा ने हार नहीं मानी।

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इमेज साभार – इंडिया टाइम्स डॉट कॉम

इस साल भारत सरकार ने उन्हें Padma shri पुरस्कार से नवाजा है।
ऐसे समय में जब राज-सिंहासन ज़हर उगलता घूम रहा है,
आपको Sharif chacha के बारे में जानने और वैसी इंसानियत को अपने अंदर उतारने की जरूरत है।
जब यहां बहिष्कार अभियान चलाया जा रहा है,
शरीफ़ चचा (শরীফ চাচা) लावारिस हिंदुओं और मुसलमानों को समान भाव कंधा दे रहे हैं।

~ Krishna Kant (Journalist)

Padma shri Sharif Chacha (শরীফ চাচা)

BBC लिंक – मुर्दों के मसीहा

शरीफ़ चचा (শরীফ চাচা)

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