NGO | जो दुआ जीने की करते हैं, मगर दवा मरने की देते हैं!

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What is NGO?

एनजीओ किसे कहा जाता है? What is ngo? यह प्रश्न अक्सर हम खोजते रहते हैं – अगर आप (Non Governmental Organization) को समझते होंगे तो इसे ही NGO का full form कहा जाता है तो इसे ही Short form में NGO बोला जाता हैं।

तमाम NGO यानि ‘अशासकीय संस्था’ या गैर–सरकारी संगठन आज विश्वभर में कार्यरत हैं। जिनके शुरुआत में भले ही समाज–सेवा की भावना रही हो, लेकिन वास्तव में आज इनका स्वरूप बिल्कुल बदल गया है और स्थिति अब इस प्रकार की हो गयी है कि सेवा के नाम पर यह क्षेत्र भी अपनी सेवा का चोखा धंधा बन गया है।

इस क्षेत्र में नेताओं के साथ-साथ ऊंचे-ऊंचे पदों से रिटायर हुए अधिकारी अपने-अपने हाथ आज़मा रहे हैं, क्योंकि जन-कल्याण के लिए सहायता-अनुदान देने वाले विभागों में अच्छे रसूख कायम करने में भी ये सक्षम होते हैं, इसमें इनके प्रेज़ीडेन्ट तथा सेक्रेटरी अथवा अन्य प्रतिनिधि की वाकपटुता प्रभावित करने वाली होती है, जिससे संगठन को फ़ंड मिलने में सुविधा होती है।

दूसरे इनके कार्यालय भी सभी सुविधाओं से युक्त और स्वागत कक्ष भी आकर्षक होते हैं। जहाँ सेमिनार तथा सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, वे हॉल भी इतने सुसज्जित होते हैं कि वी॰आई॰पी अतिथि गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते।

दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ये बदलते वक़्त के अनुसार नए-नए विषय चुनते हैं और संगठन का नाम भी इतना आकर्षक और गंभीर रखते हैं, जो कि सरकार और अनुदान देने वाली विदेशी एजेंसियों को भी खूब पसंद आते हैं और फिर ये इनकी परियोजनाओं को बहुत आसानी से अनुमोदित कर देते हैं। इनकी कथनी और करनी का अंतर जगजाहिर है। ये थैलासीमिया को साथ रखते हैं, लेकिन मलेरिया रोकने कि टेबलेट का इंतजाम भी नहीं कर पाते।

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“ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया” कुछ यही हालत इन गैर-सरकारी संगठनों की भी है, क्योंकि दुनिया भर में कार्यरत इन संगठनों को अरबों-खरबों का अनुदान मिलता है, लेकिन जिनके नाम पर यह धन बटोरा जा रहा है, उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है।

भारत में स्थिति यह है कि यहाँ ज़्यादातर NGO आरक्षण के खिलाफ़ लामबंद हैं जबकि सभी दलित और आदिवासी आरक्षण के समर्थक हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि इन दलितों के कल्याण के नाम पर ये विपुल धनराशि आवंटित करवा लेते हैं। और उन पर खर्च करने के बजाए खुद ही डकार जाते हैं तथा अपने संगठनों में भी दलितों का नाममात्र और बहुत नीचे स्तर का प्रतिनिधित्व रखते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ये NGO दलितों के कितने हिमायती हैं?

क्रमश:


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