Badhai | पिशाच-पर्व पर शुभकामनाओं का राक्षसी-उत्सव

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सभी अपनी जाति के लिए शोक मनाते हैं, पीर पराई समझने वाला वैष्णवजन तो यहां कोई नहीं है।

मुस्लिम को फिलिस्तीन पर दु:ख होता है, मोसुल पर नहीं।

बाबरी पर दुःख होता है, बामियान पर नहीं।

ब्राह्मण को अपनी जाति का अपराधी भी अच्छा लगता है।

आदिवासी के लिए नक्सल-हिंसा वैदिक हिंसा जैसी है, जो हिंसा न भवति।

दलित के लिए सामाजिक न्याय बराबरी नहीं विशेषाधिकार है। जिसे पाना नहीं, छीनना है।

स्त्री पितृसत्ता से घृणा करती है मातृसत्ता से नहीं।

स्त्री छल-शोषण भी कर सकती है, यह नारीवादियों के आख्यान में भूले से नहीं दिखता।

यहां सभी को दूसरों में दोष दिखता है।

कोई न्याय के लिए कोई नहीं लड़ता, यहां सभी अपनी-अपनी जाति के लिए लड़ते हैं।

एक पशु की ही कोई जाति नहीं, एक पशु के लिए ही कोई शोक नहीं मनाता।

उल्टे पशु का वध कर सभी उत्सव मनाते हैं, Badhai देते हैं– वही सारे जो एक अंश अन्याय भी सह नहीं सकते थे अपनी जाति पर। सभी स्वार्थी हैं। सभी आत्मतुष्ट।

तुम्हारी Badhai और पशुवध पर अब चुप नहीं रहा जाता

मैं तो हर अन्याय पर मौन रहता हूँ– कुटिलता से नहीं विडम्बना से।

किन्तु अब पशु पर हो रही क्रूरता पर ही चुप नहीं रह पाता।

उस निरीह का नाश मुझको खटकता है, जाति तो मेरी पहले ही नहीं थी, धर्म ना था, अब लगता है कदाचित् मैं मनुष्य भी नहीं हूं।

मुझे पशु के लिए शोक होता है, सबको अपनी जाति के लिए होता है, कदाचित् मैं जाति से पशु हूँ!

इसलिए पिशाच-पर्व पर शुभकामना का राक्षसी-उत्सव मनाने वाले अनेक मित्रों को आज एक एक करके अमित्र कर दिया।

कुछ तो बहुत ही निकट थे। दु:ख हुआ अमित्र करते हुए, किंतु मेरे सामने क्या विकल्प था?

कुछ ऐसे थे, जिन्हें चाहकर भी अमित्र नहीं कर सकता था, उसके लिए मेरे हृदय में ग्लानि है और अपराध-बोध भी कि मेरे जीवन का क्या मोल?

जो मैं राक्षसी-वृत्ति दिखाने वालों को अमित्र भी नहीं कर सका।

तुमको ज़रा भी लज्जा नहीं आती?

लेखक, कवि, पत्रकार, संवेदनशील प्राणी, बुद्धिजीवी- तुमको लज्जा नहीं आती, ईश्वर की उन मूक कातर संतानों को चार लोगों ने बांधकर वध कर दिया और तुम Badhai देते हो? तुम्हारी कविता किस काम की, जो तुममें करुणा नहीं जगा सकी।

तुम्हारे साहित्य का क्या मोल? इस संसार में कोई क्यों कविता लिखे, कोई क्यों अंतश्चेतना की बात करे, जब इतना नहीं कह सकते तुम तो मैं Badhai इसके लिए ना दूंगा, ना स्वीकार करूंगा।

रीढ़ की हड्‌डी को मरे हुए पशु की खाल की तरह उतारकर कहां रख आए तुम, लेखक? तुम्हारी अंतश्चेतना का क्या हुआ? वध किए जा रहे पशु की आंखें तुमको दु:स्वप्न में डराती क्यों नहीं?

तुम्हें शर्म नहीं आई मुबारकबाद बोलते हुए?

हर वो धर्म जो कहता है कि-

पशुओं को घास पर अनंतकाल तक चलने का अधिकार नहीं, जीवन का अधिकार नहीं, अपनी संतानों को निहारने का वैसा अधिकार नहीं जैसा मनुष्य को है, कि पशुओं की चेतना का आकार मनुष्य से छोटा है या कदाचित् उनमें चेतना ही नहीं, भावना ही नहीं, बुद्धि तो बिल्कुल भी नहीं, कि वो ईश्वर की सौतेली संतानें हैं, यह धरती उनकी मां नहीं, वो प्राणी नहीं हैं पौष्टिक आहार हैं, स्वादिष्ट हैं।

उनकी हत्या करो ऐसे अडोल मन से जैसे हमने सच में ही नहीं देखी हो उनकी आँखों में जीवन की याचना, क्रूरता से कुचल दो जैसे बलवान रौंदता है दुर्बल को और इसे ईश्वरीय विधान पुकारो, सभी क़ानूनों और शपथों से उन्हें देश निकाला दे दो केवल इसीलिए कि वो बोल नहीं सकते, वधिक बनो, दया का दमन कर दो, और उसका उत्सव मनाओ उनके सर्वनाश का, शुभकामनाएं बांटो, शुभकामनाएं सहर्ष स्वीकारो–

ये धर्म नहीं अधर्म है, पाप है, अंतःकरण पर दाग़ है!

ऐसे किसी भी धर्म से अपनी रक्षा करो!

~सुशोभित शेखावत

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