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Thursday, October 21, 2021

Indian muslims | Profit and loss (in Hindi)

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Indian muslims – Profit and loss

आज की बात शुरू करते 2008 में आयी एक Hollywood फिल्म की कहानी से फिल्म का नाम The day the earth stood still है। इसकी कहानी थोड़ी अजीब सी है।

पृथ्वी पर कुछ Aliens ऑब्जेक्ट्स आते हैं जो प्लेनेट से पूरी मानव जाति को खत्म करना चाहते हैं। इसका नेतृत्व कियानू रीव्स के हाथ में था। कारण यह था कि वे पृथ्वी या इस जैसे प्लेनेट्स के दोस्त थे और उन Species को खत्म कर देना चाहते थे जो अपने Planet को नष्ट कर रहे थे। जैसे कि इंसान, दरअसल उनका अतीत भी कुछ ऐसा ही था और वे अब किसी और को यह गलती नहीं करने देना चाहते थे। नायिका हेलन के साथ उनकी मुलाकात एक प्रोफेसर से होती है जहाँ हुए वार्तालाप के बाद उनका मन बदल जाता है और वे नैनोबोट्स से होती तबाही को रोक कर वापस हो जाते हैं।

क्या जागरण अंत तक पहुँचने पर ही होता है?

यह वार्तालाप मुझे आज तक याद है कि हम लोग अपने आसपास की चीजों की तब तक परवाह नहीं करते जब तक हम आखिरी छोर तक न पहुंच जायें और हमारे अस्तित्व पर ही न संकट आ जाये। उन Aliens में भी यह जागरण अपने अंत तक पहुंचने के बाद हुआ था और हम पृथ्वीवासी भी इस पृथ्वी की अहमियत तब समझ पायेंगे जब तक इसका और हमारा, दोनों का अस्तित्व खतरे में न पड़ जाये।

Indian-Muslims

जागरूक हो रहे हैं Indian muslims

इस चीज का मौजूदा दौर में उपयोग मुझे Indian muslims करते साफ दिख रहे हैं। वे जो कुढ़मगज थे, वो जो पंचर बनाने वाले कहे जाते थे, वे जिनकी औरतें बंद गोभियां, शामियाने कही जाती थीं। जिन्होंने कभी परवाह नहीं की अपने समाज, अपने पिछड़ेपन की, अपनी कट्टरता की, अपनी तरक्की, अपनी जागरूकता, अपनी भारतीयता की। आज जागरूक होते दिख रहे हैं।

बेशक, एक नहीं अनेक कमियां रही हैं इस समाज में। वे इंसान अच्छे रहे, हो सकते हैं लेकिन बतौर नागरिक उतने अच्छे नहीं थे। यहां बात तुलना की नहीं, कि फलाने में भी कमी है या ढिमाके में भी यह कमी थी। जब उनकी बात होगी तो उन पर बात की जायेगी, यहाँ बात Indian muslims की है तो इन मुसलमानों की कमी पर ही बात होगी।

उनकी कमियों के पीछे सबसे बड़ा कारण पिछली सरकारों की पुश्तपनाही थी, जिसे तुष्टिकरण के रूप में प्रचारित किया गया। जो समाज के तौर पर मुसलमानों की कोई बेहतरी तो कभी न कर सका, उल्टे छोटे-मोटे मौकों पर सरकारों का नाजायज सपोर्ट सामने खड़े बहुसंख्यकों के मन में एक द्वेष भाव जरूर पैदा करता गया। पहले की राजनीति यह थी कि हिंदू वोट में फलां-फलां तो अपने हैं ही, Indian muslims को सहला-बहला कर साधते रहो, जीत निश्चित है। चाहे उनका सामाजिक तौर पर कोई भला करो न करो।

देश का पुराना परिदृश्य बदल चुका है!

90 के दशक से भाजपा ने इस परिदृश्य (Scenario) को चेंज करना शुरू कर दिया और पहली साइड के उन हिंदुओं को साधना शुरू किया जिन्हें राजनीति के मौजूदा स्वरूप से आपत्ति थी और वे बहुसंख्य होने के नाते अपने पर विशेष ध्यान चाहते थे।

Indian-Muslims

बहरहाल 2014 तक सब कुछ बदल गया और राजनीति इधर से उधर केंद्रित हो गयी। अब तो Secularism का झंडा ले कर राजनीति करने वाले स्पष्ट तौर पर Indian muslims के साथ दिखने से भी कतराने लगे हैं, साथ खड़े होना तो दूर की बात है। पूरा सिस्टम, न्यायपालिका, कार्यपालिका सब जैसे अब एक रंग में रंगे दिखाई देने लगे हैं और यह रंग मुसलमानों के लिये फ्रेंडली तो नहीं है, यह साफ दिख रहा है और समझा भी जा सकता है। Exactly यही वह Moment है जिसका जिक्र शुरुआत में किया। किसी प्रजाति के अस्तित्व पर मिटने का संकट। जहाँ उसे अपने होने का सही अहसास होता है।

अरबी बनने वाले युवा अब भारतीय बन रहे हैं!

जहाँ से वह बदलता है, जहाँ से वह लड़ना शुरू करता है। राजनीतिक रूप से बिरयानी का तेज पत्ता बना समाज अब राजनीति समझता दिखने लगा है। अरबी बनने की धुन में मीलों आगे निकल गया नौजवान अब भारतीय बनने की कोशिश करने लगा है। जिन बातों पर पहले वह नाक-भौं सिकोड़ लेता था, अब उन पर बात करने लगा है। वे घरेलू औरतें जो सब्जी खरीदने भी घर से नहीं निकलती थीं, जिनका बाहर निकला बस शादी, मय्यत, दवा लेने या बीमार की मिजाजपुर्सी तक सीमित था, वे आज सड़क पर उतर आई हैं। जो गूंगी गुड़ियायें थीं, वे अब कैमरों के सामने भी बोलने लगी हैं।

आप कह सकते हैं कि पहले वे अपनी मानसिक गुलामी से तो लड़ लें,
जिसका प्रदर्शन वे नकाब पहन कर कर रही हैं।
लेकिन वे घर से निकली हैं सरकार से लड़ने तो यही क्या कम है।
कहीं से तो शुरुआत होगी, यहीं से सही। उनमें आत्मविश्वास पैदा होगा तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा।
उन्हें बहुत कुछ बदलना है लेकिन सारे बदलाव एकदम से तो नहीं हो जाते।
अभी तक तो दसियों सालों से एक जैसा ही चल रहा था।
अब जागरूकता आयेगी तो बहुत कुछ बदलेगा।
यह Indian muslims के पुनर्जागरण का काल कहा जाये तो गलत नहीं होगा
और इसकी नौबत इसलिये आई क्योंकि उन्हें अब अपना अस्तित्व ही खतरे में लग रहा है।
साफ तौर पर कहा जाये तो कगार पर पहुंचने के बाद या नीचे गिरना होता है या लड़ना।
उन्होंने लड़ने का विकल्प चुना! यही उनके बदलने की कहानी है।

हर लड़ाई जीतने के लिए ही नहीं लड़ी जाती!

हाँ संघ और भाजपा के हार्डकोर समर्थकों के लिये यह जीत का मौका हो सकता है,
वे जम कर हंसी उड़ा सकते हैं, कि आज Indian muslims डर गये,
कि मोदी की वजह से सारे मुल्ले औकात में आ गये लेकिन
हम जैसों की नजर में यह मोदी की कामयाबी है, जो Indian muslims में
वाकई सुधार और बदलाव देखना चाहते हैं। कि मोदी ने एक हद तक
मुर्दा और पिछड़े समाज को बदल जाने की राह दिखाई।
कम से कम अब वे सड़क पर निकल कर अपना हक मांगना तो सीखे,
अब उन्हें पढ़-लिख कर सिस्टम में अपनी भागीदारी की जरूरत तो समझ में आई,
राजनीति में अपनी सही जगह तो समझ में आई।

यकीन मानिए, इस चीज को आप नहीं महसूस कर सकते।
इस लड़ाई का नतीजा भले ही कुछ न निकले लेकिन Indian muslims का
जो भला मुस्लिम हितैषी पार्टियां न कर सकीं, वह नफरत और दुश्मनी में
भाजपा ने कर दिया। बाकी हर लड़ाई जीतने के लिये तो नहीं लड़ी जाती,
कुछ लड़ाईयां इसलिये भी लड़ी जाती हैं कि अगली नस्लों को यह संदेश दिया जा सकें
कि सामने मुकाबिल कितना ही ताकतवर क्यों न हो, अगर बात हक़ की है
तो लड़ना ही आखिरी विकल्प है, न कि Give up करना।

~अशफाक़ अहमद

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