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रविवार, मई 16, 2021

Qurbani क्या गैर जरूरी कर्मकांड है?

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आज के प्रचलित Islam में ‘Eid-ul-Azha’ के मौके पर दुनिया भर के मुसलमान जानवरों की बलि देते हैं।
जिसे हम और आप Qurbani के नाम से जानते हैं। लेकिन Qurbani की असली हकीकत क्या है? Islam में इस परंपरा के पीछे क्या किवदंती है? आइये आज इसे विस्तार से जानते हैं।

Qurbani से जुड़ी कथा क्या कहती है?

Qurbani

‘पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम को बहुत समय से बच्चे नहीं हो रहे थे। मगर जब उन्होंने अल्लाह से दुआ की तो उनके यहां बेटे इस्माइल ने जन्म लिया। जब इस्माइल तेरह बरस के हुए, उस समय इब्राहीम की उम्र निन्नानबे (99) साल थी। कहते हैं इब्राहीम को एक सपना आया जिसमें ‘ख़ुदा’ ने उनसे अपनी सबसे प्यारी ‘वस्तु’ को समर्पित/क़ुर्बान करने के लिए बोला। जिसके बाद इब्राहीम ने अपने सबसे प्यारे बेटे ‘इस्माइल’ को क़ुर्बान करने को सोचा।

कथा आगे कहती है कि Qurbani के वक़्त जब इब्राहीम अपनी और अपने बेटे की आंखों पर पट्टी बांध कर अपने बेटे के गर्दन पर छुरी चलाने ही वाले होते हैं, तभी एक फ़रिश्ता वहां से ‘इस्माइल’ को हटा कर उसकी जगह पर एक ‘भेड़’ रख देता है, जिसे इब्राहीम अपना बेटा समझ कर काट देते हैं। बाद में अल्लाह कहता है कि वो उनका इम्तिहान ले रहा था। वो इब्राहीम की Qurbani को स्वीकार कर लेता है।

धारणा Vs परम्परा

Islam के मानने वाले Eid-ul-Azha के दिन पैग़ंबर इब्राहीम द्वारा दी गयी इसी Qurbani की पुनरावृत्ति करते हैं। वो बात अलग है कि ये धारणा सिर्फ Islam आने के बाद ‘बनाई’ गई है क्योंकि इस जैसी किसी ‘परम्परा’ का ज़िक्र कुरान में भी नहीं है, कि इस वजह से पहले के लोग Qurbani करते थे। और न ही क़ुरान ये कहता है कि ‘दुनिया के सारे’ मुसलमान इस दिन ‘जानवर’ क़ुर्बान करें। क़ुरान जिस Qurbani का ज़िक्र करता है वो अरब में बहुत पहले से प्रचलित थी। जिसे बाद में इस्लाम का हिस्सा बना लिया गया।

अरब में Qurbani इस्लाम के आने के बहुत पहले से ही प्रचलन में थी। इस्लाम से पहले अरब के लोग हज की समाप्ति पर देवी की मूर्ति के आगे एक जानवर क़ुर्बान करते थे। उस समय इस परंपरा का ‘इब्राहीम’ और उनके बेटे ‘इस्माइल’ से कोई सम्बन्ध न था। हज की समाप्ति पर ये परंपरा सिर्फ और सिर्फ देवी को प्रसन्न करने के लिए की जाती थी, ये ज्ञात रहे कि हज की परंपरा भी इस्लाम के पहले से ही थी और बाद में इसे इस्लाम में शामिल कर लिया गया।

ये यहूदियों की परम्परा थी!

अरबों ने Qurbani की इस परंपरा को यहूदियों से लिया था, यहूदी धर्म में ‘क़ुर्बान’ की अवधारणा सदियों से चली आ रही थी। ‘क़ुर्बान’ का हिब्रू में शाब्दिक अर्थ होता है ‘त्याग’। इस परंपरा के अंतर्गत यहूदी अपने खेत के पहले अन्न, अपनी गाय का पहला दूध, अपने झुंड के पहले जानवर को ‘क़ुर्बान’ किया करते थे। यहूदियों द्वारा जानवरों की बलि एक ‘वेदी’ पर दी जाती थी जिसका थोड़ा सा माँस वेदी की अग्नि में जला दिया जाता था।

बाद में अरबों ने अपनाया इसे

अरबों ने जब इस परंपरा को अपनाया तो उन्होंने ‘काबा’ के पास बनी ‘बलि वेदी’ पर जानवर को क़ुर्बान करना शुरू किया। अरब यहूदियों की ही तरह सदैव जानवर ही नहीं क़ुर्बान करते थे बल्कि वो भी दूध, तेल, शराब, अन्न, और क़ीमती गहनों को भी ‘क़ुर्बान’ किया करते थे। जानवरों की कुर्बानी के मामले में अरबों की ये धारणा थी कि ‘अल्लाह’ और अन्य देवी-देवताओं के पास सिर्फ काटे हुये जानवर का ‘खून’ पहुँचता है और ‘अल्लाह’ उस खून से ही प्रसन्न हो जाता है।

इस बात का प्रमाण है कुरान की आयत 22:37 जो कहती है:

‘उनका माँस अल्लाह तक नहीं पहुँचेगा, और न ही उनका खून, मगर जो उसके पास पहुँचेगा वो है तुम्हारी भक्ति’।

और उस से पहले कुरान की आयत 22:34 कहती है कि:

‘और सारे धर्मों के लिए हमने नियम बनाए, कि वो अल्लाह को समर्पित कर सकते हैं जो उसने उनको दिया है (Qurbani के) जानवर के रूप में। मगर तुम्हारे लिए एक ख़ुदा है इसलिए तुम उसके आगे समर्पित करो’

ये आयत बता रही है Qurbani की बहुत पुरानी परंपरा थी। ये Islam से बहुत पहले से होती आ रही थी। Islam के बाद सिर्फ ये किया गया कि जहां पहले देवी और देवताओं के नाम पर जानवर ‘क़ुर्बान’ किये जाते थे वहीं अब सिर्फ़ एक ‘अल्लाह’ का नाम लिया जाने लगा और अन्य देवी-देवताओं के नाम को हटा दिया गया।

कैसे Qurbani परंपरा को अनिवार्य नियम बनाया गया?

Islam मानने के लिए हर मुसलमान को Islam के पांच नियमों या पांच स्तम्भों को मानना होता है। और वो स्तम्भ हैं ईमान (शहादाह), सलात (नमाज़/प्रार्थना), ज़कात (दान), रोजा (व्रत) और हज (तीर्थयात्रा)। ये Islam के पांच स्तम्भ हैं जिन्हें हर मुसलमान को मानना होता है, इसमें ध्यान देने वाली बात ये है कि इन पांच स्तम्भों में ‘Qurbani’ कहीं भी नहीं आती है।

कुछ लोग दलील देते हैं कि Qurbani हज का हिस्सा है इसलिए वो पांचवें स्तम्भ में आ जाती है। तो मेरा उनसे ये सवाल होगा कि अगर Qurbani हज का हिस्सा है तो वो दुनिया के उन सारे मुसलमानों के लिए क्यों हैं जो अपने घरों में बैठ कर Qurbani कर रहे हैं? अगर ये हज का एक अरकान (कर्मकांड) है तो फिर सारी दुनिया के मुसलमानों को इसे करने की क्या ज़रूरत है? जो हज पर गया है वो इसे वहां करेगा।

Qurbani एक गैरजरूरी कर्मकांड है!

ये समझना हमारे लिए ज़रूरी है कि ‘क़ुरान’ और हदीस में जितने भी उदाहरण हैं Qurbani के, वो सब के सब ‘हज’ के एक कर्मकांड के रूप में ही हैं। ऐसी कोई भी हदीस और कोई आयत नहीं है जो ये कहे कि ‘सारी दुनिया के मुसलमानों को इस समय जानवर की Qurbani देनी है।’ इसे सारी दुनिया के मुसलमानों के लिए एक ज़रूरी कर्मकांड वैसे ही बना दिया गया जैसे तीन तलाक़, हलाला और बुर्क़ा को बनाया गया है। Qurbani को कैसे प्रचलित किया गया और किसने किया? इसके लिए हर उस मुसलमान को पढ़ने की ज़रूरत है जो ये सोचता है कि ये उसके लिए एक ‘धार्मिक’ और ‘ज़रूरी’ कर्मकांड है।

~ताबिश सिद्धार्थ


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