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Thursday, October 21, 2021

Superstitious Jihadi culture is new in the country

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कभी आपके मन में यह सवाल उभरता है कि यह गोलियाँ चलाते,
पेट पर बम बांध के उड़ते Superstitious जिहादी आखिर कैसे तैयार होते हैं?
कैसे वे अपने Future से मुंह मोड़ कर, अपनी पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को
दूर झटक कर आतंक की राह पर निकल खड़े होते हैं?

Superstitious से Terrorist बनने का सफर!

इसके लिये पहली योग्यता तो यह चाहिये कि बंदा बुरी तरह अंध-धार्मिक (Superstitious) होना चाहिये,
खास कम्यूनिटी के लोगों के बीच बने बनाये सर्किल में
बर्मा, कश्मीर, फिलिस्तीन के, और इराक, अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के किये
कथित अत्याचारों से संबंधित ढेरों फोटो, वीडियो, खबरों वाला कंटेट तमाम सच्ची-झूठी कहानियों के साथ पास ऑन होता रहता है…

जिससे यह साबित होता हो कि कैसे अमेरिकी, इज्राइली, भारतीय (ईसाई, यहूदी, हिंदू) मुसलमानों के खिलाफ साजिश करके बेचारे मुसलमानों का कत्लेआम करने में लगे हैं।

Superstitious activities

तमाम Innocent (यहां बेवकूफ कह सकते हैं) उन सब चीजों को इधर-उधर फारवर्ड करते रहते हैं,
बिना यह सोचे-समझे कि इस तरह का दिल दहलाऊ, नफरत से सिहरा देने वाला
कंटेंट इंसान के मन मस्तिष्क पर क्या असर डालता है?
साथ ही वह खास हदीसें भी हवा में तैरती रहती हैं, जो यह बताती हैं
कि खास गुस्ताखों, मुर्तदों, कुफ्फारों को उनकी गुस्ताखियों के एवज में रसूल और खलीफाओं ने कैसे-कैसे सजा दी।

Beginning of jihad

फिर यह सब देखते सुनते Superstitious बंदा बागी हो जाता है… उसे लगता है कितना जुल्म हो रहा है दुनिया भर में मुसलमानों पर, और अगर आज मुसलमानों ने पलटवार न किया तो इस दुनिया से मुसलमान मिटा दिये जायेंगे… और वह हथियार उठा लेता है, लोगों को गोलियों से उड़ा देता है, बम बांध कर दग जाता है… और समर्थकों द्वारा मुसलमानों के बीच उसके शौर्य का गुणगान करके अगले जिहादियों की तलाश शुरू हो जाती है।

जिहाद का भगवा रूप

यह भारत से बाहर की चीजें थीं… जिसका भारत में न्यूनतम प्रभाव था, लेकिन दुनिया ग्लोबल हो रही है, तो भारत कैसे इस पैटर्न से अप्रभावित रहता… हाँ इसकी शक्ल बदल गयी है। अब यह Superstitious भगवा फार्मेट में है…

यहां भी तरीका वही है… यूपी, बिहार, केरल, बंगाल, असम या किसी कोने खुदरे से निकले (बस उसका किसी मुसलमान से रिश्ता निकल सके) तमाम तरह के वीभत्स फोटो, वीडियो, खबरों से भरा दिल दहलाऊ कंटेंट सच्ची-झूठी कहानियों के साथ ठीक उसी अंदाज में परोसा जा रहा है। हर वह अपराध जो पीड़ित और अपराधी के बीच वैयक्तिक स्तर पर होता है, उसे बड़ी सफाई से हिंदू बनाम मुसलमान बना कर पेश कर दिया जाता है।

वे इसमें हदीसों का छौंक लगाते थे और यह इसमें ऊल-जुलूल अतीत, इतिहास का छौंक लगाते हैं… और धर्म के नाम पर संक्रमित इनके समर्थक ऐसी चीजों को बिना किसी डर-झिझक धड़ल्ले से पास फारवर्ड रहे हैं…

Superstitious शंभू जैसे लोग मानव बम बन गए!

Superstitious Jihadi

उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं कि उनकी इस हरकत से किसी शंभू के अवचेतन में कैसा जहर भर जायेगा और परिणति में कैसे वह कुल्हाड़ी केरोसिन के साथ मानव बम बना नजर आयेगा। मरने दो उसे… फिर उसके शौर्य की गाथा का गुणगान करके नये शंभुओं के लिये जमीन तैयार की जाने लगेगी… और यूँ अंध-धार्मिक (Superstitious) जिहादी पैटर्न हमारे अपने देश में भी स्थापित हो जायेगा।

क्या आपको बिगड़ते समाज की फिक्र होती है?

आप समर्थन या विरोध के नाम पर जब इस तरह के हौलनाक कंटेंट को जब नचाते हैं तो क्या एक पल के लिये भी सोचते हैं कि इसका किसी के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? फिर आपको बिगड़ते समाज की फिक्र होती है…? गंधाती राजनीति की फिक्र होती है?

आप में से कितने लोग खुद को समझदार समझते हैं?

कहने को तो हर कोई खुद को समझदार ही समझता है, लेकिन इस देश में कितने ऐसे समझदार हैं जो थोपी गयी या उधार की सोच से किनारा करके खुद की सोच विकसित करते हैं। खुद का आकलन कीजिये इस पैमाने पर कि आप किसी न किसी धर्म के बाड़े में खड़े विरासत में मिली सोच को ढो रहे हैं। या फिर किसी भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथ या मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, लालू, नीतीश, येचुरी जैसी पार्टियों और नेताओं का झंडा उठाये उनकी दी हुई सोच को जी रहे हैं।

किसी शंभू के लिये आपका समर्थन इसी धर्म और राजनीति की मिली-जुली सोच की परिणति है।

देश में संख्या किसकी ज्यादा है?

देश में संख्या किसकी ज्यादा है खुद की सोच वालों की या भेड़ की तरह उधार की सोच पर चलने वालों की? जाहिर है भेड़ों की संख्या हमेशा ज्यादा ही होती है, तो नेताओं की राजनीति भी उन्हीं के लिये होगी, न कि उनके लिये जो किसी भी दल की सोच ढोने के लिये तैयार नहीं।

खुद को रख के सोचिये किसी नेता की जगह… आप वही परोसेंगे जिसकी आपसे आपकी समर्थक भीड़ उम्मीद लगाये है।

देश में विकसित होता जिहादी कल्चर!

यहां राजनीति का जिक्र इसलिये है कि जिस Superstitious जिहादी पैटर्न की बात हो यही है… उसे पोषण और ताकत इसी स्रोत से मिलती है। तो धर्म आधारित राजनीति और नया-नया विकसित होता जिहादी कल्चर अब हमारा नया हासिल है… कहीं न कहीं हम सब इसमें भागीदार हैं और इसके लिये जिम्मेदार भी हैं।

तो चलिये, हम सब आई स्टैंड विद शंभू रैगर करके लग जाते हैं… अब वही हमारा हीरो है… और उसे समर्थन नहीं मिलेगा तो समाज से नये-नये शंभू निकल कर सामने कैसे आयेंगे…? डरने की बात नहीं, धर्म के नाम पर बनी सरकार पूरे सपोर्ट में है और अपनी करतूत को इफ-बट के सहारे जस्टिफाई करने में तो आपको महारत हासिल ही है… तो मिल के एक और तालिबानी समाज का निर्माण करते हैं।

~अशफाक़ अहमद

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