Vilupt | क्या मनुष्य की विलक्षण शक्तियां प्रकृति ने छीन लिया है?

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Vilupt-Shaktiyaan

अगर आप किसी मेंढक जैसे जीव को ध्यान से देखें तो उसके माथे के बीचोबीच आपको एक उभरी हुई Gland अथवा तीसरी आंख नजर आएगी जिसे Pineal Gland अथवा पेराइटल आंख कहते हैं। यह तीसरी आंख रोशनी के आधार पर दिन-रात का पता लगाने और ठंडे रक्त वाले जीवों में शरीर के तापमान, निद्रा चक्र और प्रजनन चक्र का नियंत्रण करने वाले वाले हार्मोन Melatonin का निर्माण करती है।

विलुप्त हो चुकी है तीसरी आंख

Vilupt-Shaktiyaan

स्तनधारी जीवों के पूर्वजों के फॉसिल्स अध्ययन के आधार पर हमें पता चला है कि लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले यह तीसरी आंख धीरे-धीरे सिकुड़ते हुए Vilupt होनी शुरू हो गयी थी। इस आंख के सिकुड़ने का अर्थ यह था कि सामान्य आंख इस हद तक सक्षम हो चुकी थी कि दिन-रात का पता लगा सके। इसके अलावा Warm Blooded होने के कारण हमारे पूर्वजों को शारीरिक चक्र नियंत्रण के लिए भी इस फालतू आंख की कोई खास ज़रूरत नहीं थी, इसलिए भी इसका Vilupt होना लाज़िमी था।

यही प्रकृति का नियम है। समय के साथ जो अंग हमारे काम के नहीं रहते अथवा बेहद ज्यादा Energy का उपयोग करते हैं, उन्हें Evolution द्वारा सुषुप्त कर दिया जाता है। पर बहरहाल… पूरी तरह इस आंख को खोने की बजाय इसका अवशेष “Pineal gland” के रूप में अब भी हमारे सर में मौजूद है जो Melatonin hormone का निर्माण करती है।

पर मनुष्य की विलुप्त शक्तियां जिसे प्रकृति ने छीन लिया उसकी फ़ेहरिस्त यहीं खत्म नहीं हो जाती। इसके बाद अगला नंबर है-

Vilupt हो चुकी Electromagnetic Detection

शार्क समेत कई मछलियों में शरीर में मौजूद खास सेंसरी न्यूरॉन्स के सहारे पानी में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों को डिटेक्ट करने की अद्भुत क्षमता होती है जिसका इस्तेमाल वे रास्ता ढूंढने, शिकार करने इत्यादि के लिए करती हैं। समुद्र में घुले सोडियम और क्लोरीन के आवेशित कण बिजली का संवहन करते हैं पर हवा में विधुतचुम्बकीय किरणें उतनी प्रभावी नहीं हैं और हमारे पूर्वजों ने “दृश्य क्षमता” के आधार पर जीना सीख लिया था इसलिए विद्युत किरणों को Detect करने की क्षमता हमारे भीतर से Vilupt होती गयी।

विलुप्त हो चुकी Pheromone Detection

इस लिस्ट में अगली शक्ति है “फेरोमोंस डिटेक्शन” की।
कीड़े-मकौड़े इत्यादि कई जीव आपस में संवाद करने के लिए कुछ खास रासायनिक अणुओं का आदान-प्रदान करते हैं।
इन अणुओं को Detect करने वाली Gland हमारी नाक में भी मौजूद है
पर चूंकि हम बोल-चाल कर बेहतर संवाद कर पाते हैं,
यह Gland भी अवशेषी रूप में ही हमारे भीतर मौजूद है।

बेसिकली होता यह है कि जब प्रकृति को कोई शारीरिक गुण समाप्त करना हो
तो उस गुण को जन्म देने वाली Gene में किसी आवश्यक Protein को गायब करके प्रकृति
उस Gene को “सुषुप्त” कर देती है पर सुषुप्तावस्था में ही सही, वह Gene रहता हमारे DNA में ही है।

तो क्या ऐसी Gene का पता लगा कर और उनमें आवश्यक Protein को मिलाकर
हम भविष्य में अति-मानवीय शक्तियों से युक्त इंसानों का निर्माण कर सकते हैं?

क्रिस्पर तकनीक से संभव है डीएनए एडिटिंग

यह इतना भी आसान नहीं है। बेशक हमनें पूर्व में ऐसी ही कुछ Genes में सफल छेड़छाड़ करके कई जीवों में दुर्लभ गुणों को जन्म दिया है। पर इंसानी शरीर इतना सरल नही। हमारा शरीर उन Genes को धारण करने लायक नहीं। सरल शब्दों में: हमारी हार्डवेयर इतनी अलग हो चुकी है कि उन नए गुणों को जन्म देने से पहले हमारे शरीर की पूरी इंजीनियरिंग को एक नये सिरे से बदलना होना। मैं इसे असंभव भी नहीं कहता… CRISPR जैसी DNA एडीटिंग तकनीक के दम पर, आज नहीं तो कल, हम इंसानों की एक खास प्रजाति की इंजीनियरिंग करने में समर्थ अवश्य होंगे। सभ्यताओं के इतिहास और इंसानी चरित्र की मूल प्रवृत्ति के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि उस खास प्रजाति का इस्तेमाल युद्ध जैसे प्रयोजनों में ही किया जाएगा।

शायद, हम जल्द एक ऐसी दुनिया में कदम रखने वाले हैं
जिसमें जीवन “खोज” से कहीं अधिक “प्रयोग” का विषय होगा।
या शायद… रख भी चुके हैं।

~विजय राज शर्मा
You like it or not but it’s inevitable!!
Thanks For Reading !!!

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