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बुधवार, अप्रैल 14, 2021

Waseem Rizvi का 26 आयतों वाला प्रपंच

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Waseem Rizvi shia waqf board के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं ने विगत दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जिस में उन्होंने मांग रखी कि कुरान से 26 आयतों को हटाने का आदेश दिया जाए।

26 आयतें हटा लेने से क्या ठीक हो जाएगा?

अब सोचिए कि 26 आयतें हटा लेने से किसी को क्या मिल जाएगा? क्या कोई आतंकवादी उन आयतों को पढ़कर आतंकवादी बनता है? नहीं! 98% भारतीय मुस्लिम अरबी भाषा समझता ही नहीं है। वो क़ुरान को बिना समझे ही पढ़ता है। पढ़ता भी कहां है, बस रट्टा मारता है। कुरान में क्या लिखा हुआ है, उसके क्या माने हैं? इस का उसे कुछ पता नहीं होता।

मेरे रिश्तेदार का जब निकाह हो रहा था तो मैं वहां था। मेरा एक हिन्दू दोस्त भी साथ गया था। मैंने उससे कहा कि देखो ये मौलाना क्या पढ़ रहा है, तुम्हें इसका हिन्दी अनुवाद बताता हूँ।

वहां हो रही तमाम रस्मों के बाद मौलाना दुवा में चार “क़ुल” पढ़ने लगे। जानकारी के लिए बता दूँ कि चार “क़ुल” लगभग हर जगह पढ़ा जाता हैं। किसी के मरने पर भी, फ़ातिहा पर भी और ख़ुशी के मौके पर भी। एक क़ुल “क़ुलिया अय्योहल क़ाफीरुना” जब पढ़ा, तब मैंने उसका हिन्दी अनुवाद अपने हिन्दू दोस्त को बताया। वो इस प्रकार है-

“कह दो (ऐ मोहम्मद) काफ़िरों से, जिसकी तुम पूजा करते हो, उसकी मैं नहीं करता। जिसकी मैं करता हूँ, उसकी तुम नहीं करते। जिसकी तुम पूजा करते हो, उसकी मैं कभी नहीं करूंगा और जिसकी मैं करता हूँ उसकी तुम कभी नहीं करोगे। इसलिए तुम्हें तुम्हारा दीन मुबारक, मुझे मेरा दीन!

इसके बाद सब दुवा मांगते और निकाह पूरा हो जाता है। हिन्दू दोस्त हंसने लगा.. उसने कहा कि “निकाह से इस का क्या लेना देना है? यहां पर काफ़िरों को क्यों कोसा जा रहा है? मैंने कहा यही चल रहा है। ये सब अंधे-बहरों की तरह हैं। क्या पढ़ा गया? क्या सुना गया? उसका कोई मतलब नहीं। बस अरबी में जो बोला गया, वो बस बोला गया.. सुन लिया.. माशा अल्लाह, सुभान अल्लाह बोला और निकाह हो पूरा हो गया!

ऐसे ही वसीम रिज़वी साहब हैं। वो सारे मुल्क़ को “बेवकूफ़” बना कर ये बता रहे हैं कि फलां 26 आयतों से ही लोग कट्टर बन रहे हैं। ये आयते हटा दो, सब गाय बन जाएंगे। जबकि इसका हक़ीक़त से कोई लेना-देना नहीं है। अरे भाई, अनुवाद के साथ वो आयतें पढ़ता कौन है? एक मुसलमान ही नहीं जानता कि उसमें लिखा क्या है? रिजवी साहब आपने सनसनी मचाने के लिए ये सब किया है तो अलग बात है। लेकिन आपकी शिक्षा का जो मूल है। वही आतंकवादियों का मूल है। वही सूफ़ियों का मूल है। वही धार्मिक कट्टर पंथियों का मूल है।

मुख्य होती है, विचारधारा

जब इस्लाम की शुरुआत ही इस वाक्य से होती है कि “नहीं है कोई देवता, सिवाए अल्लाह के” तो फिर आप कितनी भी आयतें हटवा लें, मूल नहीं बदल जाएगा। ये भारतीयों को “मूर्ख” बनाने वाला मसला है।

Waseem Rizvi साहब को सच में दिक़्क़त है तो “छोड़” दें इस्लाम! ख़ुद को व बीवी-बच्चों को बाहर निकाल लें जैसा कि मैंने किया है। मुझे भी लोग समझाते थे कि आप “सूफ़ी” बन जाइए, हिंदुओं को “मूर्ख” बनाते रहिये। ईश्वर, अल्लाह तेरो नाम जपते रहिये! मगर मैं समझ चुका था कि इस से पूरी तरह से “मुक्त” होना होगा। तभी आपकी नस्लों को इस अरबी बर्बर मानसिकता से छुटकारा मिल सकता है!

नहीं समझ आता है तो पूरी तरह से खुद को बाहर निकालिए। ये क्या बात हुई कि 26 आयत बदल दो, तो ISIS वाले “बुद्धत्व” को प्राप्त हो जाएंगे। यह सब स्टंट है, वर्तमान सत्ता को लुभाने के लिए। इस से कुछ नहीं होगा। “बड़े लोगों” को थोड़ा सा ऑर्गेज़म मिलेगा.. बस!

आप का कहना हैं कि क़ुरान की आयतें जिसके लिए Waseem Rizvi shia waqf board के पूर्व चेयरमैन ने बवाल किया हुआ है, वो आयतें उस दौर के युद्ध और ज़ुल्म के दौरान नाज़िल हुई थी, इसलिए अब इस दौर में उस पर सवाल उठाना बेकार की बात है.. जिन आयतों में काफ़िरों को मारने की बात हो रही है, वो उस दौर की बात थी जब अरब में युद्ध का माहौल था।

तो आज भी ऐसी आयतों को पढ़ते क्यों हैं?

ठीक है, वो सब उस दौर के युद्ध और ज़ुल्म की बातें थीं तो अब इस दौर में उनको पढ़ने से क्या मतलब निकलता है? अगर आप ये बात कहते हैं कि वो उस समय काल की बातें थीं, तब तो आप ये ख़ुद मान रहे हैं कि क़ुरआन की ज़्यादातर बातें आउट डेटेड हैं। और उनका इस दौर या सदी से कोई लेना देना नहीं है, है कि नहीं?

अब आप मेरी बात झुठलायेंगे। मगर इस बात को आप कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि जो कुछ भी आपके पास अपने मज़हब को लेकर दलील है, उसका इस आज के दौर से कोई लेना-देना नहीं है।

इसे ऐसे समझिये! आपके शहर का एक बच्चा जो किसी मुसलमान के घर में पैदा होता है। वो आपकी आयतों और उस दौर की हदीसों को पढ़कर “यहूदियों” से नफ़रत करने लगता है। जिस छोटे से शहर में मेरा जन्म हुआ था वहां के कसाई मुहल्ले के कसाई यहूदी लफ्ज़ सुनकर ही गाली बकने लगते थे। इन कसाईयों और आपके शहर में पैदा हुए बच्चे के आसपास सदियों से एक भी यहूदी नहीं है। मगर ये लोग 1400 साल पहले अरब के लोगों से हुई यहूदियों की लड़ाई की वजह से उस दुश्मनी में यहूदियों से नफ़रत कर रहे हैं। जबकि उस युद्ध बाद के मुसलमानों के द्वारा यहूदी ही अपने वतन से मारकर भगा दिए गए थे। लेकिन उस घटना के बाद भी आप दुश्मनी के बीज़ बोते चले जा रहे हैं। आखिर क्यों?

तो मसला दरअसल ये है कि जो युद्ध मूर्तिपूजकों और दूसरे धर्मों के ख़िलाफ़ आपके पैग़म्बर और उनके साथियों ने शुरू किया था वो आज तक रुका नहीं है, ये अनवरत जारी है। ये आयतें और हदीसें आपको वो युद्ध कभी रोकने नहीं देंगी। कोई कितना भी इसे झुठला ले, किन्तु इस मज़हब की ये कड़वी हक़ीक़त है। इसे अब सब जानते हैं। यहूदियों से अनवरत नफ़रत, मूर्तिपूजकों से अनवरत नफ़रत, ईसाईयों से अनवरत नफ़रत। कोई भी ऐसा धर्म जो एक अल्लाह के सिवा किसी भी अन्य ख़ुदा की बात करे, उस से अनवरत नफ़रत इस “कल्ट” का मूल है, इसकी मुख्य शिक्षा यही है।

1400 साल पहले जो लड़ाई शुरू हुई थी, वो आज भी लगातार जारी है और तब तक जारी रहेगी जब तक इस्लाम की आइडियोलॉजी हमारी धरती पर है। आप कितना भी लीपा-पोती कर लें, ये सब कभी ख़त्म नहीं होगा। रिज़वी साहब (Waseem Rizvi) क़ुरआन से आयतें हटवा देंगे तो क्या वो आयतें सारी दुनिया की क़ुरआन से डिलीट हो जाएगी? नहीं.. कभी नहीं.. आयतें, हदीसें, और इतिहास सब कुछ इसी शिक्षा से लैस है। और वो है “युद्ध”! हर धर्म से युद्ध! ये कितना भी कहें कि ये उस दौर की बात है, इसे मानिए मत.. जब तक आप इसे पढ़ना नहीं छोड़ेंगे तब तक कोई इस बात यक़ीन क्यों करें? कि आप उसे बस पढ़ते हैं और मानते नहीं हैं! कोई क्यों मानें कि आप बस उस दौर के 1400 साल पहले के मूर्तिपूजकों से नफ़रत करते हैं, आज वालों से नहीं!

ये सब बकवास है! सच अब सबको पता है। सोमनाथ और बुद्ध की मूर्तियां आपको आज भी खटकती हैं! ये आपको हमेशा खटकेगी! क्योंकि आपकी मूल शिक्षा यही है।

क्या सच में पैगम्बर पर जुल्म किया जा रहा था?

आगे दलील यह दी जाती है कि पैग़म्बर पर मक्का और बाक़ी जगह के लोग ज़ुल्म कर रहे थे। यहूदी ज़ुल्म कर रहे थे, मूर्तिपूजक ज़ुल्म कर रहे थे। इसलिए उन्होंने अपनी सेना बनाई और जुल्म करने वालों से युद्ध किया था।

आइए इस ज़ुल्म और ज़्यादती की परिभाषा को विस्तार से समझते हैं।

उस समय आपके पैग़म्बर एक नए धार्मिक आइडिया के साथ फील्ड में उतरे थे। अब धार्मिक आइडिया की जगह आसमानी कहें या कोई और नाम दें सच को इस से फ़र्क नहीं पड़ेगा। यही सौ प्रतिशत सच है।

मोहम्मद साहब का आईडिया क्या था? वो था ये कि सब लोग बहुत सारे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वो उनके हिसाब से ग़लत था। उनका कहना था कि सबको एक अल्लाह की पूजा करनी चाहिए। सबको अपना हज़ारों सालों पुराना धर्म त्याग कर इस “नए आइडिया” को अपना लेना चाहिए। अरब वाले अल्लाह को पहले से पूजते थे मगर उसके साथ अन्य देवी-देवताओं को भी पूजते थे। किन्तु मोहम्मद साहब की ज़िद ये थी कि सब कुछ छोड़ दो, सारे मंदिर तोड़ दो, सारे देवता, सारी मूर्तियां तोड़ दो, सिर्फ एक अल्लाह को मानों। यही मोहम्मद साहब और अरब वालों के बीच लड़ाई का मूल था।

अब इसे ऐसे समझिए, कि यहां भारत में गुरु नानक खड़े हो जाते और कहते कि बस एक ओंकार मानो और सब कुछ छोड़ दो, सारे मंदिर तोड़ दो, सारे देवी देवता की मूर्तियां तोड़ दो और बस जो मैं कह रहा हूँ वो सुनो! तो यहां के हिन्दू या और अन्य धर्म वाले जो हज़ारों सालों से अपना धर्म मान रहे थे, गुरु नानक का विरोध करते तो क्या आप इसे गुरु नानक पर ज़ुल्म समझते?

एक अकेला आदमी, अपनी ज़िद पर अड़ा है! उसके पास सिर्फ अपना एक आइडिया है। वो ख़ुद को पैग़म्बर बोलता है जिसका गवाह भी वो खुद ही है। वो अपनी वाणी को “क़ुरआन” कहता है इसे वो आसमानी बताता है, जिसका गवाह भी वो खुद ही है। हर बात का गवाह वो खुद है और अपनी हर बात को वो सर्वोपरि भी रखता है। मक्का वाले जो सदियों से अपने देवताओं की पूजा करते हैं उस से इस हद तक समझौते पर राज़ी हो जाते हैं कि “एक दिन तू इबादत कर अपने अल्लाह की काबा में एक दिन हम करेंगे, मिल के रहेंगे, आ समझौता कर लेते हैं क्योंकि तू हमारे ही क़बीले का बंदा है” मगर वो मानता नहीं है, कहता है कि नहीं, तुम्हारे सारे देवताओं की मूर्तियां मैं तोडूंगा। अब सब उस की इस ज़िद से नाराज़ हो जाते हैं तो सब उसके ऊपर ज़ुल्म करने लगते हैं?

अंत में क्या हुआ था?

अंत में मोहम्मद साहब क्या करते हैं। ग़ुलामों और गरीबों को मिला कर, कम्युनिस्ट स्टाइल में अपनी सेना बना कर मक्का पर चढ़ाई कर के काबा पर कब्ज़ा कर लेते हैं। सारे देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ देते हैं। सारे मंदिर गिरा दिए जाते हैं। फिर भी आपकी दलील है कि ज़ुल्म मोहम्मद पर हो रहा था?

अब यहूदी वाला सीन समझिये!

सारा इस्लाम यहूदियों और ईसाईयों से लिया गया। उनकी सारी किताबें कॉपी की गईं। फिर उल्टे उन्हीं से कहा जाने लगा कि तुम्हारी किताब झूठी है, तुम लोग झूठे हो। ज़रा सोचिये, इस धांधली का क्या आलम रहा होगा। ऊपर से तुर्रा ये कि ख़ुदा ने अब मुझे तुम सब का मसीहा बना के उतारा है, अपने पैगम्बरों को छोड़ कर मुझे अपना आख़िरी पैग़म्बर मान लो।

ज़रा सोचिये, अगर आसमान में कोई ख़ुदा जैसा जीव होता, तो उसे यहूदियों को ये बताना होता कि तुम लोग ग़लत कर रहे हो। वो अरब में एक पैग़म्बर भेज के उनको कहता कि तुम लोग ग़लत हो। क्यों इसके लिए यहूदियों में उसे कोई नहीं मिला?

फिर यहूदी हंसे और हंसी उड़ाएं कि हमारे सारे धर्म की कॉपी कर ली और हम पर ही गुर्रा रहे हो। तो यहूदी इनके दुश्मन हो गए और ये यहूदियों को मारने लग जाते हैं।

इसे सोच के देखिये, ये कहते हैं इन पर ज़ुल्म हो रहा था। और 56 देशों से इन्होंने वहां के मूल निवासियों को भगा दिया है। ईरान में इस समय जो शिया लोगों का कब्ज़ा है, वो पारसियों को भगा के वहां राज कर रहे हैं और कहते हैं कि हमारे अली और पैग़म्बर हक़ के लिए लड़ रहे थे। समझिए इस तरह की उल्टी बातों को।

वहां के मूल निवासियों और मूल धर्म वालों को अपने ही देश से बेदख़ल भी कर दिया और हाय अली, हाय हुसैन कर के बड़े इंसानियत के पैरोकार भी बनने लगे।

सोचिए कि जब चोर ही चिल्लाने लगे कि “चोर आया… चोर आया”… तब आप किसको चोर समझेंगे और किसको शाह? यही इस्लाम की हक़ीक़त है। इनके अनुयायी चिल्लाते इतना है कि दुनिया कंफ्यूज हो जाती है कि क्या सच है, क्या झूठ।

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